गीत/नवगीत

होली की हंसी ठिठोली

फागुन आया मस्ती लाया, रंगों की पिचकारी लाया,
गली-गली में शोर मचा है  “होली है!” सबने गाया।
कल तक जो थे बड़े सयाने, आज बने मतवाले,
लाल, हरे गुलाल में सब लगते रंगीले निराले।

मम्मी बोली  “धीरे खेलो!” पापा बोले  “संभल के!”
पर जैसे ही टोली निकली, भागे सब उछल के।
कोई छत से रंग बरसाए, कोई करे फुहारी,
साफ-सुथरे चेहरे पर  पल में बन जाएँ चित्रकारी।

एक मित्र तो ऐसे रंगे, पहचान न पाई अम्मा,
आईना भी सोच में पड़ गया  “ये कौन है भैया ?”
जो कल तक थे सीधे-सादे, आज बने शैतान,
होली ने सबको दे डाला मस्ती भरा वरदान।

पर सुन लो प्यारी सी बातें, इसमें छुपा संदेश,
रंग लगाओ प्रेम भरा हो, न हो कोई क्लेश।
हँसी-ठिठोली हो पर सीमा में, सबका मान रहे,
त्योहार तभी सुहाना होगा जब सब सम्मान रहे।

आओ मिलकर कसम ये खाएँ, नफ़रत दूर भगाएँ,
प्यार, दया और भाईचारे के रंग जग में हम  फैलाएँ।
हँसी, खुशी से मनाएँ होली, मन का मैल धुलाएँ,
रंगों वाली इस ठिठोली से रिश्ते हम महकाएँ।

— डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’

डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"

ग्वालियर (म.प्र)