हास्य व्यंग्य

खट्टा-मीठा : रोना आता है

बहुत दुःख की बात है यारो कि बारबाला को आज बहुत रोना आ रहा है। बेचारी दहाड़ें मार-मारकर छाती पीट-पीटकर रो रही है, जैसे कि अभी-अभी विधवा हुई हो। इतना रोना तो उसको पेरुम्बदूर में बम फटने पर भी नहीं आया था, जिसमें उसका पति मारा गया था।

उसके इस रोने पर मुझे भी रोना आ रहा है, क्योंकि उसके आँसू खास-खास मौके पर ही निकलते हैं। जब भी कहीं कोई कटासुर आतंकवादी (वैसे ये दोनों शब्द पर्यायवाची हैं) मारा जाता है, तो उनके आँसू संसार को दिखायी पड़ने लगते हैं। किसी जेहादी के मरने पर नर्तकीनन्दन के चेहरे पर भी मुर्दनी छा जाती है। उसको रोता हुआ या गमगीन देखकर उसके तमाम चमचे भी दहाड़ें मारकर रोने लगते हैं और सरकार को कोसने लगते हैं कि उन्होंने जेहादी को मरने से बचाया क्यों नहीं।

बारबाला और नर्तकीनन्दन दोनों को रोना केवल जेहादी कटासुरों की मौत पर आता है। उनमें से किसी को तब रोना नहीं आया, जब कश्मीर में लाखों हिन्दुओं को मार-मारकर भगाया गया था। उनको तब कोई दुःख नहीं हुआ, जब दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने हमारे जवानों को मार बारूदी सुरंग के विस्फोट में मार डाला था। उन दोनों में से किसी को तब भी रोना नहीं आया था, जब समुद्र के रास्ते से आकर पाकिस्तानी आतंकियों ने ताज होटल पर हमला किया था और सैकड़ों निर्दोष नागरिकों को मार डाला था।

उनको रोना तब भी नहीं आया, जब पुलवामा में कार-विस्फोट में हमारे 40 से अधिक वीर जवानों को मार दिया गया था। उनकी आँखों से तब एक भी आँसू नहीं निकला, जब पहलगाम में हिन्दू पर्यटकों को नाम और धर्म पूछकर गोलियों से भून दिया गया था। उनके मुँह से तब आह तक नहीं निकली, जब बंगलादेश में हिन्दू युवकों को पीट-पीटकर जिन्दा जला दिया गया था।

लेकिन उनको अब रोना आ रहा है क्योंकि जेहादी आतंकियों के आका खोमनेई को इस्रायल ने बम डालकर मार दिया है। इसी खोमनेई ने सैकड़ों नाबालिग लड़कियों को केवल हिजाब न पहनने के कारण मार डाला था या फाँसी पर लटका दिया था। उनके अलावा भी उसने हजारों नौजवानों को गोलियों से भुनवा दिया था, क्योंकि वे लोकतंत्र और आजादी की माँग कर रहे थे।

इटालियन बार डांसर और उसकी औलाद को तब भी बहुत जोर से रोना आया था, जब बाटला हाउस के एनकाउंटर में चार जेहादी आतंकवादी मारे गये थे। उनको तब भी रोना आया था, जब अमेरिका के कमांडो ने पाकिस्तान में घुसकर इनके लादेन ‘जी’ को मारकर 72 हूरों के पास भेज दिया था।

इस सबसे स्पष्ट है कि बारबाला और उसके कपूत नर्तकीनन्दन के आँसू केवल खास-खास मौके पर निकलने के लिए रखे रहते हैं। जब भी कोई भारत का दुश्मन मारा जाता है, तो वे बाहर आ जाते हैं, वरना भीतर ही भीतर संचित रहते हैं। मुझे उनकी इस सड़ियल मानसिकता पर रोना आ रहा है।

— बीजू ब्रजवासी
फाल्गुन पूर्णिमा, सं. 2082 वि. (3 मार्च, 2026)

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