उसको कितना गम है सताता
हंसता है कोई दीवारों के बाहर भी
कोई अंदर ही अंदर सुलगता है जाता
किसी के अंदर झांक कर कोई कैसे देखे
कि उसको कितना गम है सताता
बाहर से जो दिखता है वह अंदर नहीं है
अंदर वही है जो किसी को नज़र नहीं आता
वही जान सकता है जिस पर है बीत रही
ज़िंदा वही है इंसान जो दुखों से नहीं है घबराता
शांत है बाहर अंदर चल रहा भयंकर तूफान
डरता नहीं खड़ा है फिर भी सीना तान
जीतेगा वही जो करेगा डटकर मुकाबला
जिंदगी में देने पड़ते हैं कई इम्तहान
सुख दुख का तो जीवन मे लगा रहेगा आना जाना
यहाँ कोई नहीं स्थाई यह जग है एक मुसाफिर खाना
खुशियां मिलेगी किसी को किसी को मिलेगा ग़म
बीत गया जो वक्त वह फिर लौट कर नहीं है आना
आदमी जब मुसीबतों से है घिर जाता
दूर दूर तक घोर तम कुछ नज़र नहीं आता
तब दूर नज़र आती है रोशनी की एक किरण
छुप जाता है अंधेरा एक नई राह है दिखाता
— रवींद्र कुमार शर्मा
