परीक्षा
तन गई प्रत्यंचा,
खींचा गया डोर,
दागे जा रहे अक्षर-तीर
चहुं ओर,
लड़ रहे नन्हे योद्धा
अदम्य साहस के साथ,
अनजान अभी भी
नैतिक-अनैतिक के व्यूह-पथ,
अक्षरों के ये शर
चीरते मन-मस्तिष्क की दीवार,
फिर भी सजग हैं बच्चे,
करने प्रत्युत्तर प्रहार,
एकाग्रता का कवच ओढ़े,
संकल्पों की ढाल लिए,
क्षणिक विचलन भी यहाँ
अंधकार के द्वार दिए,
जीतना यह रण अनिवार्य,
त्यागने होंगे संशय-संघार,
हर बहाना, हर बाधा को
रखना होगा दूर अपार,
दुश्मन के वही पुराने दाँव,
पर अब सुसज्जित है नई पीढ़ी,
ज्ञान-शस्त्रों से सुसज्जित,
लिख रही अपनी तकदीर नई,
यह जंग लौटे हर वर्ष,
प्रश्नों के जंजाल लिए,
उत्तर बन कर काटना है
हर संशय के जाल लिए,
महायुद्ध अब भी जारी है,
विजय-किला दृष्टि में साकार,
पताका फहराने को
साध रहे हैं वर्ष भर का संभार।
— राजेन्द्र लाहिरी
