कविता

कडवा यथार्थ 

हाय-हाय करते नित रहते।

लूट-पाट कर वे जेबें भरते।

दहशतगर्दी मकसद इनका–

कलंकित मानवता करते।।

खुद को वे सर्वश्रेष्ठ मानते।

अपनी ही धुन में नित रहते।

स्वार्थी वे परपीडा क्या जाने–

दादागिरी कर रौब जमाएं।।

रौंद रहे वे शुभ संस्कारों को।

नीति नियम कायदे कानून को।

नीडर घुमते मस्त मलंग से–

बेलगाम दुष्ट ये डराते सबको।।

सारी खुशियां अपनी झोली में।

दुःख अपनों को ढलती शाम में।

थामना था जब हाथ हाथों में।

छोड आये सपूत वृद्धाश्रम में।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८