कविता

कभी तो सच लिख

सुना है, अक्षरों से तुम्हारा नाता है,
पर शब्दों में पाखंड का अंधियारा छाता है,
ऐ मित्र, मुखौटों की भीड़ में मत विचलित दिख,
कभी तो निर्भीक होकर सच लिख।

प्रकृति ने जो दिया, वह सरल वरदान है,
फिर क्यों कर्मकांडों में उलझा इंसान है?
जो बीज कुटिलता के बोता है चुपचाप,
वो सत्य से करता रहता है परिहास।

चलो, जिसे जो करना है, वह करता रहे,
पर शिक्षित होकर क्यों तर्क से डरता रहे?
हर पंक्ति में जब कुतर्क का जाल बुनो,
तो ज्ञान के दीप को क्यों खुद ही बुझो?

चमत्कारों की छाया में क्यों खो जाते हो,
असंभव को भी संभव बतलाते हो,
आस्था को सिर झुकाकर मान लिया,
पर तर्क से क्यों नज़रें चुराते हो?

यह विज्ञान का युग है, जागो, समझो,
विचारों के पंखों को थोड़ा तो परखो,
परंपरा की जंजीरों में क्यों जकड़े हो,
वाहियात बातों से मन क्यों भरे हो?

शब्द तुम्हारे समाज का आईना बनते हैं,
फिर क्यों भ्रम के बादल इनमें तिरते हैं?
लेखक हो—तो सत्य की मशाल थामो,
जांचो, परखो, फिर अपनी कलम को थामो।

न बनो बिन पेंदे के लोटे की पहचान,
स्थिरता में ही छुपा है लेखक का सम्मान,
राजनयिक छल से नहीं, स्पष्टता से बोलो,
जनता को उलझाओ नहीं—सच के साथ खोलो।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554