संचय
हम शहर से तेरे आ गए तो मगर,
सुन मेरे साथिया दिल वही रख दिए।
देख जबसे लिए तुझको यह दो नयन
इस अधर ने सखे प्रीत रस चख लिए।
तुझको छू न सके पर तसल्ली तो है
तेरी परिधि में हम तो समा भी गए,
साथ तेरा मिला बस क्षणिक ही सही
इस ह्रदय में तुझी को बसा आ गए।
प्रज्वलित कर दिए बाती यूँ प्रेम की
लौ से उसकी तुम रौशन जगत कर गए।
हम शहर से तेरे आ गए तो मगर…..
यह पवन सुन प्रिये अभी कह कर गई,
हाल तेरा भी कुछ-कुछ हमारे सा है,
कैसे कह दे सखे अपने एहसास को
हाल मेरा भी अब तो तुम्हारे सा है।
इस हृदय ने संचित किये हर क्षण हर पल
धार उसको ह्रदय मे सनम आ गए।
हम शहर से तेरे आ गए तो मगर……
सुन मेरे साथिया दिल वही रख दिए।
देख जबसे लिए तुझको यह दो नयन
इस अधर ने सखे प्रीत रस चख लिए।
— सविता सिंह मीरा
