कविता

काम तो राम ही आयेंगे

काम तो राम ही आयेंगे
यह तो हम सबको पता है,
पर ज्यादा भरोसा नहीं है।
क्योंकि हम खुद को राम समझते हैं,
राम से ज्यादा खुद पर विश्वास करते हैं
यह और बात है कि रोते भी उन्हीं से हैं 
रो गाकर उनकी कृपा पा लेते हैं 
और धन्यवाद तक कहने में 
अपना अपमान समझते हैं,
क्योंकि हम स्वार्थी और कंगाल होते हैं।
अब राम जी तो ठहरे भोले-भाले 
जो इतना ध्यान भी तो नहीं देते 
हमारी गुस्ताखियाँ भी बिसार देते, 
अपने तो दोनों हाथ में लड्डू संग खूब मजे हैं
अपना स्वार्थ भी सिद्ध कर लेते हैं 
और राम जी श्रेय भी नहीं देते हैं।
वैसे भी राम जी तो अपने हैं 
ऊपर से बेचारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,
ऐसे में उन्हें काम तो आना ही पड़ता है।
अब आप ही बताओ कि रामजी मेरे काम आते हैं 
तो भला कौन सा अहसान करते हैं?
फिर हम भी तो राम जी के ही पास जाते हैं,
क्योंकि वे ही हमें सबसे पहले नजर आते हैं 
जब वे हमारे काम आते हैं 
तो हम भी राम नाम का थोड़ा गुण गा लेते हैं
अब राम जी को कोई शिकायत नहीं है 
तो फिर आप क्यों फटे में टाँग अड़ाते हैं 
ये हमारे और राम जी के बीच का मसला है
हम और राम जी आपस में कैसे रिश्ता निभाते हैं,
इस पर आप क्यों इतना खार खाते हैं,
या आपको राम जी समझ नहीं आते हैं।

*सुधीर श्रीवास्तव

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