जल उठा तालाब
“जल उठा तालाब” सुनते ही मन में अग्नि की छवि उभरती है, परन्तु यहाँ आग की लपटें दिखाई नहीं देतीं यहाँ जल स्वयं जलकर समाप्त हो रहा है। यह एक प्रतीक है उस भयावह स्थिति का, जब भीषण गर्मी, प्रचंड सूर्य की किरणें और बिगड़ता पर्यावरण मिलकर जीवन के स्रोत को ही सुखा देते हैं।
तालाब, जो कभी गाँव की जीवनरेखा हुआ करता था, आज सूखी धरती का आईना बन गया है। पहले जहाँ जल की लहरें सूर्य के प्रकाश में चमकती थीं, वहीं अब फटी हुई मिट्टी सूर्य की तपिश को और बढ़ा देती है। ऐसा लगता है मानो तालाब का जल धीरे-धीरे जलकर आकाश में विलीन हो गया हो।
यह “जलना” वास्तव में वाष्पीकरण की प्रक्रिया है, पर इसके पीछे छिपा कारण केवल प्रकृति नहीं, बल्कि मानव की लापरवाही भी है।
अत्यधिक पेड़ों की कटाई, जल स्रोतों का अतिक्रमण, और पानी के संरक्षण की अनदेखी ये सभी कारण मिलकर इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। सूर्य की तीखी किरणें जब बिना किसी हरियाली के सीधे धरती पर पड़ती हैं, तो जल जल्दी सूख जाता है। यही कारण है कि आज “जल उठा तालाब” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक चेतावनी बन चुका है।
और हमें सोचने पर मजबूर करता है कि यदि आज हम नहीं संभले, तो आने वाले समय में पानी केवल एक स्मृति बनकर रह जाएगा। हमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण और पर्यावरण संतुलन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, तभी यह “जलता हुआ तालाब” फिर से शीतल और जीवनदायी बन सकेगा।
वों सूरज की तेज नजर, जल को जलाकर कर रही राख।
संभल जाओ आज ही, नहीं तो मिट जायेगी पानी की साख ।।
— सोमेश देवांगन
