ग़ज़ल
गुंचे-सा जब भी रह गया ख़ुद में बिखर के मैं
तब अश्क बन के आँख से आया उतर के मैं
ज़र्फ़ ओ शऊर आज भी हमराह हैं मेरे
पहुँचा हूँ इस मक़ाम पे ख़ुद से गुज़र के मैं
जाते हैं इस जहान को सब छोड़ के कहाँ
देखूँगा जीते जी कभी इक बार मर के मैं
हैरत से घूरता मिले मुझको ही आइना
देखूँ कभी जो अक्स को थोड़ा सँवर के मैं
तपता रहा हूँ इल्म की भट्टी में रात-दिन
तब जा के आ सका कहीं थोड़ा निखर के मैं
— अजय ‘अज्ञात ‘
