राजनीति

हाईवे और एक्सप्रेस वे के दोनों तरफ शहर बसाना हो सकता है फायदेमंद

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण ने पारंपरिक शहर नियोजन की सीमाओं को उजागर कर दिया है। महानगरों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव, यातायात जाम, प्रदूषण, आवास संकट और अव्यवस्थित विस्तार (अर्बन स्प्रॉल) जैसी समस्याएँ अब गंभीर रूप ले चुकी हैं। ऐसे समय में यह विचार कि राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेस वे के दोनों ओर नियोजित ढंग से नए शहर और उपनगर बसाए जाएँ, केवल एक बुनियादी ढांचा आधारित कल्पना नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक शहरी विकास रणनीति के रूप में उभर रहा है। यदि इस मॉडल को वैज्ञानिक शहरी नियोजन, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक आवश्यकताओं के साथ जोड़ा जाए, तो यह भविष्य के संतुलित और विकेंद्रीकृत शहरी विकास का आधार बन सकता है।

आर्थिक कॉरिडोर आधारित विकास की अवधारणा पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर विशेष रूप से चर्चा में रही है। विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि जब परिवहन अवसंरचना—जैसे एक्सप्रेस वे, रेलवे और लॉजिस्टिक हब—के साथ–साथ औद्योगिक, आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों का समेकित विकास किया जाता है, तो इससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को व्यापक गति मिलती है। आर्थिक कॉरिडोर मॉडल का उद्देश्य केवल यातायात को तेज करना नहीं, बल्कि उसके साथ–साथ नए औद्योगिक शहर, लॉजिस्टिक पार्क, वेयरहाउसिंग ज़ोन और आवासीय कॉलोनियों का निर्माण करना होता है, जिससे रोजगार और निवेश दोनों को बढ़ावा मिलता है। 

भारत में दिल्ली–मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर, अमृतसर–कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर और विभिन्न राज्य स्तरीय एक्सप्रेस वे परियोजनाएँ इसी सोच का परिणाम हैं। इन परियोजनाओं के साथ नियोजित औद्योगिक टाउनशिप और स्मार्ट सिटी विकसित करने की योजना बनाई गई है ताकि हाईवे केवल परिवहन मार्ग न रहकर आर्थिक गतिविधियों की धुरी बन सकें। दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे के आसपास नए औद्योगिक क्षेत्र, लॉजिस्टिक पार्क और आवासीय परियोजनाओं की योजनाएँ इसी दिशा में उठाया गया कदम हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकारें अब सड़क अवसंरचना को केवल यात्रा सुविधा नहीं, बल्कि समग्र क्षेत्रीय विकास के साधन के रूप में देख रही हैं। 

हाईवे और एक्सप्रेस वे के किनारे शहर बसाने का सबसे बड़ा लाभ कनेक्टिविटी के रूप में सामने आता है। पारंपरिक शहरों में अक्सर औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय कॉलोनियाँ और व्यापारिक केंद्र एक ही भूभाग में अनियोजित ढंग से विकसित हो जाते हैं, जिससे यातायात का अत्यधिक दबाव और अव्यवस्था पैदा होती है। इसके विपरीत, यदि नए शहर पहले से मौजूद उच्च गुणवत्ता वाले मार्गों के किनारे बसाए जाएँ, तो वहाँ आने–जाने की सुविधा प्रारंभ से ही बेहतर रहती है। इससे न केवल यात्रा समय कम होता है, बल्कि व्यापार, पर्यटन और सेवाओं की आवाजाही भी तेज होती है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाती है।

विश्व बैंक के शहरी विकास से जुड़े अध्ययनों में यह बताया गया है कि परिवहन अवसंरचना और भूमि उपयोग (लैंड यूज़) की संयुक्त योजना से शहर अधिक उत्पादक और रहने योग्य बनते हैं। ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट जैसे मॉडल यह सिद्ध करते हैं कि जब रोजगार, आवास और सेवाओं को परिवहन नेटवर्क के आसपास केंद्रित किया जाता है, तो इससे आर्थिक उत्पादकता बढ़ती है, आवागमन की दूरी घटती है और शहरी जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है। 

हाईवे आधारित शहरों का एक महत्वपूर्ण लाभ यह भी है कि वे पारंपरिक महानगरों पर जनसंख्या का दबाव कम कर सकते हैं। आज दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे शहर अत्यधिक भीड़, प्रदूषण और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। यदि इनके आसपास या इन्हें जोड़ने वाले एक्सप्रेस वे के किनारे नियोजित उपग्रह शहर विकसित किए जाएँ, तो लोग रोजगार और बेहतर जीवन गुणवत्ता की तलाश में इन नए शहरों की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इससे मूल महानगरों का भार कम होगा और क्षेत्रीय संतुलन स्थापित होगा।

रियल एस्टेट और भूमि उपयोग के संदर्भ में भी एक्सप्रेस वे कॉरिडोर आधारित शहरों का प्रभाव उल्लेखनीय होता है। हाल के वर्षों में यमुना एक्सप्रेस वे और अन्य प्रमुख मार्गों के आसपास भूमि की कीमतों में तेजी से वृद्धि देखी गई है, जिसका प्रमुख कारण बेहतर कनेक्टिविटी और भविष्य में विकसित होने वाली अवसंरचना है।  यह स्थिति निवेशकों और डेवलपर्स को आकर्षित करती है, जिससे नए आवासीय और वाणिज्यिक परियोजनाओं का विकास तेज हो जाता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।

हालाँकि, केवल हाईवे के किनारे शहर बसाने का विचार तभी सफल हो सकता है जब उसे वैज्ञानिक और दीर्घकालिक शहरी नियोजन के साथ लागू किया जाए। यदि बिना पर्याप्त योजना के केवल सड़क के दोनों ओर अनियंत्रित निर्माण होने दिया जाए, तो वही समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं जो आज पुराने शहरों में दिखाई देती हैं—जैसे अतिक्रमण, अवैध कॉलोनियाँ, जल निकासी की समस्या और पर्यावरणीय क्षति। इसलिए आवश्यक है कि ऐसे शहरों के लिए पहले से मास्टर प्लान तैयार किया जाए, जिसमें आवासीय, औद्योगिक, हरित क्षेत्र, जल स्रोत, सार्वजनिक परिवहन और सामाजिक अवसंरचना के लिए स्पष्ट प्रावधान हों।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी इस मॉडल को सावधानीपूर्वक लागू करना आवश्यक है। एक्सप्रेस वे निर्माण के कारण कई बार कृषि भूमि, वन क्षेत्र और जल स्रोत प्रभावित होते हैं। यदि उनके किनारे बड़े पैमाने पर शहरीकरण किया जाता है, तो पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए हरित पट्टियाँ, जल संरक्षण संरचनाएँ और जैव विविधता कॉरिडोर जैसी व्यवस्थाएँ अनिवार्य रूप से शामिल की जानी चाहिए। दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे के साथ बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और वन्यजीव ओवरपास जैसी पहलें यह संकेत देती हैं कि अवसंरचना विकास और पर्यावरण संरक्षण को साथ–साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। 

सामाजिक दृष्टि से भी यह विचार महत्वपूर्ण है कि नए शहर केवल अमीर वर्ग या निवेशकों के लिए न बन जाएँ, बल्कि उनमें सभी आय वर्गों के लिए आवास और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हों। यदि एक्सप्रेस वे के किनारे विकसित शहर केवल उच्च आय वर्ग के गेटेड टाउनशिप बनकर रह जाएँ, तो इससे सामाजिक असमानता और स्थानिक विभाजन बढ़ सकता है। इसलिए शहरी नियोजन में सस्ती आवास योजनाएँ, सार्वजनिक स्कूल, अस्पताल, बाजार और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

भारत जैसे देश में जहाँ ग्रामीण से शहरी पलायन लगातार बढ़ रहा है, एक्सप्रेस वे आधारित शहर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी अवसर प्रदान कर सकते हैं। यदि इन शहरों में कृषि प्रसंस्करण उद्योग, लघु और मध्यम उद्योग तथा कौशल प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था भी सशक्त हो सकती है। इससे लोग अपने मूल स्थानों के पास ही रोजगार पा सकते हैं और महानगरों की ओर अनियंत्रित पलायन कम हो सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि हाईवे के किनारे शहर बसाने का मॉडल केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में भी उपयोगी हो सकता है। सुव्यवस्थित सड़क नेटवर्क और नियोजित बस्तियाँ आपातकालीन सेवाओं, सैन्य आवागमन और राहत कार्यों को अधिक तेज़ और प्रभावी बना सकती हैं। कोविड महामारी के दौरान यह स्पष्ट हुआ था कि जिन क्षेत्रों में सड़क और परिवहन अवसंरचना बेहतर थी, वहाँ चिकित्सा सहायता और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति अपेक्षाकृत सुगम रही।

फिर भी इस मॉडल के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हुए हैं। यदि अत्यधिक शहरीकरण हाईवे के किनारे केंद्रित हो जाए और सार्वजनिक परिवहन की अनदेखी की जाए, तो निजी वाहनों पर निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे दीर्घकाल में यातायात और प्रदूषण की समस्या फिर से उभर सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि एक्सप्रेस वे आधारित शहरों में मेट्रो, बस रैपिड ट्रांजिट और साइकिल मार्ग जैसे विकल्पों को भी समाहित किया जाए, ताकि विकास केवल वाहन आधारित न होकर मानव केंद्रित रहे।

अंततः यह कहा जा सकता है कि हाईवे और एक्सप्रेस वे के दोनों ओर नियोजित शहर बसाना 21वीं सदी के शहरी विकास का एक व्यावहारिक और दूरदर्शी मॉडल बन सकता है, बशर्ते इसे केवल रियल एस्टेट विस्तार या तात्कालिक आर्थिक लाभ के रूप में न देखा जाए। यदि इसे व्यापक क्षेत्रीय विकास, पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक समावेशन और आधुनिक शहरी सुविधाओं के साथ जोड़ा जाए, तो यह मॉडल भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए संतुलित, विकेंद्रीकृत और टिकाऊ शहरीकरण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इस दिशा में उठाए गए प्रत्येक कदम को दीर्घकालिक दृष्टि, वैज्ञानिक योजना और पारदर्शी क्रियान्वयन के साथ लागू करना ही इस विचार की वास्तविक सफलता सुनिश्चित करेगा।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

Leave a Reply