वो भी क्या दिन थे
वो भी क्या दिन थे, हाँ भले ख्वाब अनगिनत थे !
न मुश्किलों का डर,न बात बेबात का इतना असर!
दिलों में प्यार था गहरा,मुसिबतों से न कोई ठहरा!
जीवन था बहुत ही सादा,ख्वाहिशें भी न थी ज्यादा!
काश कोई लौटा दे वो दिन,वो अच्छे सच्चे पल क्षिण!
घर में बुजुर्गों का सम्मान,अपनेपन से सजा सामान!
मिलकर रहते आंगन,न थे मनोरंजन के इतने साधन!
अब बहुत कुछ है शायद लगे फिर भी कुछ कम है!
अपने न अपनापन,न भाती ये खुशियां अजीब ग़म हैं!
कमरे बहुत इंसान कम हैं, हर चीज़ पर आँखें नम हैं!
ज़माने बदल जाते हैं, माना बरस आते और जाते हैं!
वक्त जो बीत जाए, काश ! कभी चाहने से लौट आए।
— कामनी गुप्ता
