मतलब की डोर
मतलब की डोर से बंधा
हर एक इंसान है,
स्वार्थ से बना हर रिश्ता
आज हुई पहचान उसकी।
जब तक है मतलब,
तब तक मुस्कुराता है,
ज़रूरतें ढली नहीं कि
हर चेहरा बदल जाता है।
माँ की गोद में जो हँसी
बेफिक्र खिलखिलाती थी,
वक़्त के साथ वही ममता
बोझ उसे नज़र आती है।
जिन हाथों ने थामकर
चलना सिखाया था हमें,
आज वही काँपते हाथ
तन्हाई में रह जाते हैं।
कहीं रह गई कमी परवरिश में
या इस दौर की हवा है ऐसी,
क्यों दिल पत्थर हो गए
अपनों की ही छाया में?
बूढ़े माँ-बाप फिर भी
दुआ ही देते रहते हैं,
खामोश लबों से भी
बच्चों के ग़म सहते हैं।
ये कैसी दौड़ है,
जहाँ इंसानियत हार गई,
ज़रूरतें जीत गईं
और थम गई रिश्तों की साँस ।
— मुनीष भाटिया
