कविता

मूक हुई किलकारियाँ

मूक हुई किलकारियाँ, गुम बच्चों की रेल।
गूगल में अब खो गये, बचपन के सब खेल॥

आँगन सूना हो गया, चुप हैं घर के द्वार।
मोबाइल की रोशनी, निगल गई त्योहार॥
कंचे, गिल्ली, लट्टू कहाँ, छूटा हँसता मेल।
स्क्रीनों के जंजाल में, कैद हुआ हर खेल॥

दादी वाली कहानियाँ, सोईं लेकर धूल।
नानी के सब बोल भी, लगते अब प्रतिकूल॥
छत पर चंदा ताकना, भूले सारे बाल।
कानों में बस गूँजते, गेमों के जंजाल॥

फिर भी आशा जीवित है, बदलेगा हर काल।
लौटेगा फिर एक दिन, बचपन का उजियाल॥
माटी, धूप, पतंगें संग, हँसे गली-चौपाल।
गूँजें फिर किलकारियां, महके हर घर-द्वार॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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