कविता

स्त्रीत्व : मेरा खोया अस्तित्व

कभी आईने में खुद को देखा था,
तो आँखों में एक सपना चमकता था…
नाम मेरा भी था, पहचान मेरी भी,
जीवन मेरा मुझसे ही दमकता था।
फिर धीरे-धीरे समय ने करवट ली,
मुझे रिश्तों की परत-दर-परत चादर ओढ़ा दी गई…
कभी बेटी, कभी बहू, कभी माँ बनकर,
मेरी पहचान मुझसे ही तिरोहित हो गई।
मैं हर सुबह सबसे पहले जागी,
और सबसे आख़िर में सोई हूँ,
सबकी ख्वाहिशें पूरी करते-करते,
खुद से कितनी बार रोई हूँ।
मेरे हाथों की लकीरों में
किसी और के सपने पलते रहे,
और अपने हिस्से की धूप-छाँव भी
दूसरों के नाम लिखते रहे।
मैंने अपने अरमानों को
चुपचाप दिल में दफन किया,
हर मुस्कान के पीछे अपने
दर्द का समंदर सहन किया।
पर आज…
एक सवाल मेरे भीतर उठा है—
क्या मैं सिर्फ़ रिश्तों का नाम हूँ?
या फिर मेरा भी कोई मुकाम है?
मैं वही हूँ, जो कभी खुद के लिए जीती थी,
जिसकी आँखों में भी आसमान था…
आज फिर अपने अस्तित्व को ढूँढने निकली हूँ,
क्योंकि मेरा होना भी उतना ही महान था।
अब मैं खुद को फिर से गढ़ूँगी,
अपने सपनों को फिर से पढ़ूँगी,
जो छूट गया था राहों में कहीं,
उसे अपनी मंज़िल तक ले चलूँगी।
मैं अब किसी पहचान की मोहताज नहीं,
मेरी पहचान अब मेरा विश्वास है,
मेरे निर्णय, मेरी उड़ानें—
यही मेरा सच्चा अहसास है।
मैं स्त्री हूँ…
मैं मौन नहीं, मैं उद्घोष हूँ,
मैं बंधन नहीं, मैं मुक्त विश्वास हूँ,
मैं बुझी नहीं—अंगार हूँ,
हर अंधेरे के विरुद्ध उजास हूँ।
अब मेरा अस्तित्व खोया नहीं—
मैंने उसे खुद में फिर से जगा लिया है,
जो मैं थी, जो मैं हूँ, और जो बनूँगी—
उस हर रूप को मैंने अपना लिया है।
अब मैं किसी की परछाई नहीं,
स्वयं प्रकाश की धारा हूँ,
अपनी राह खुद बनाने वाली,
अडिग, अजेय—मैं ध्रुवतारा हूँ।
मेरी पहचान अब प्रश्न नहीं,
एक सशक्त उत्तर बनकर उभरी है—
मैंने खुद को पाया है फिर से,
और यही मेरी सबसे बड़ी जीत ठहरी है।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016

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