नाप रहे फुटपाथ
स्याही, कलम, दवात से, सजने थे जो हाथ।
कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहे फुटपाथ।।
जिन आँखों में स्वप्न थे, पढ़ने के अरमान।
धूल धुएँ में ढूँढते, जीवन का सामान।।
कैसा यह परिवेश है, कैसा यह उत्पात…
कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहे फुटपाथ।।
कंधों पर बस्ता नहीं, बोझा भारी आज।
बाल दिवस के गीत सब, लगते बेआवाज़।।
भूख छीनती बचपना, हर हँसता जज़्बात…
कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहे फुटपाथ।।
आओ मिलकर सोचिए, बदले यह हालात।
हर बच्चे को मिल सके, शिक्षा की सौगात।।
तभी चमकते देश के, होंगे सच्चे हाथ…
कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहे फुटपाथ।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
