पतझड़ के सूखे पत्ते
जीवन की है सच्चाई यही
आना है और एक दिन चले जाना है
पतझड़ के सूखे पत्ते की तरह
गिरना है और बिखर जाना है
जो खुश है उसके जीवन मे रहती है बहार
खिलता है पुष्प पतझड़ का नहीं करता ईंतंज़ार
वक्त के साथ जो नहीं चलता पिछड़ है जाता
खुश नहीं रह पाता रहता है हमेशा बेकरार
पतझड़ में पुराने पत्ते झड़ेंगे तो ही नए आएंगे
कुदरत के नियम को कोई कैसे बदल पाएंगे
हर जीव का इस धरा पर एक निश्चित है जीवन
टूटेगी जब साँसों की डोर न जाने कहाँ गुम हो जाएंगे
पतझड़ नहीं होगा तो बसंत भी नहीं आएगा
यह जीवन बिल्कुल नीरस हो जाएगा
दुख ही नहीं होगा जब जीवन में
सुख की अनुभूति कोई फिर कैसे पायेगा
— रवींद्र कुमार शर्मा
