ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
हमलोगों को रोज-रोज़
चमार तो कभी चमरोटा
कह कर बुलाते हैं।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली के कीड़े जैसी
जात है तुम्हारी।
चमरा, चमरोटा कहीं का!
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली कितना भी साफ़ कर लो
साफ़ नहीं होती।
वैसी है तुम्हारी जात!
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
अभी मारूंगा तो,
पूरे कपड़े में हगते-मूतते
घर जाओगे अपने।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोगों के ऊपर
थूकना चाहिए ,
और तुम्हारे जात पर भी !
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोग कभी नहीं सुधरोगे
ना ही कभी सुधरेगी,
तुम्हारी जात !
ऐसे-ऐसे कब तक बोलते रहेंगे?
कब तक इंसानियत का जनाजा निकालते रहेंगे?
अब ज़माना जात का नहीं,
फ़ेसबुक, इंस्टा और व्हाट्सऐप का है!
— आनन्द दास
