पुस्तक समीक्षा

खोज लें हम सत्य (कृति रवीन्द्र वर्मा)

समीक्ष्य संग्रह ‘खोज लें हम सत्य’ डॉ रवीन्द्र वर्मा की कृति समय का आईना सरीखी गीतिका की लयबद्धता, गीतों की समरसता और मुक्तकों के वैचारिक चिंतन से मानव जीवन के बुनियादी सवालों के दस्तावेज जैसा। सत्य की तलाश की खोज में रचना कार ने बिल्कुल अलग ही राह पर चलने का सार्थक प्रयास किया है।उसकी तलाश उसे धर्म स्थलों, मठ-मंदिरों, पहाड़ों, जंगलों, निर्जन स्थानों, सुरम्य वादियों के बजाय मानव भीतर झांकने, रिश्तों के विघटन की पीड़ा और सामाजिक में उतर करने की कोशिश जैसी है।
यूँ तो संग्रह में लगभग सारी रचनाएं उच्च मानकों को पूरा करती है लेकिन विवशता बस सभी रचनाओं का उल्लेख कर पाना संभव नहीं है। फिर भी कुछ एक रचनाओं की कुछ पंक्तियों को जरुर उद्धृत करना चाहूँगा।

अपनी नैतिक जिम्मेदारी का अहसास कराती कवि की पंक्तियां आज की जरूरत है-
हो रहे हैं जो युवा भटके हुए पथ,
खोल ले आंखें जगाना चाहता हूं।

पूर्वजों की सीख को आत्मसात करने के संदेश के साथ कवि लिखता है –
हमारे पूर्वजों ने है सिखाया अपनापन,
उन्हीं की सीख को खुद में समायें, साथ सभी।

आज की सामाजिक विसंगतियों पर कवी की चली कलम में एक पीड़ा भी परिलक्षित होती है –
दौड़ अंधी होड़ में ईमान अपना बेचता,
बदलता दिनभर मुखोटे कर फजीता आदमी।

विश्वसनीयता पर कवि का प्रेरक भाव उकेरती लेखनी इन पंक्तियों में साफ झलकती है-
साख अपनी हम बना कर ही चलें,
बात पर टिकना दिलाता वाह है।

और जिंदगी का पाठ पढ़ाने का एक खूबसूरत प्रयास कवि के मानवीय दृष्टिकोण का आइना बनने को आतुर दिखता है –
जिंदगी की दौड़ में हम क्यों रुकें, आगे बढ़ें।
जिंदगी है जीत हम जीत को पाने बढ़ें।
जितना है मीत तो फिर ठान लें मन में वचन-
मौत भी आए तो आखिरी ठाने बढ़ें।
संग्रह की रचनाओं में रचनाकार ने जीवन के लगभग सभी पक्षों को, क्षेत्रों, भावनाओं को समेटने का प्रयास किया है। भाषा, शिल्प, शब्द संयोजन की दृष्टि से अपने छंद ज्ञान से अभिसिंचित कर इसे श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम ही नहीं संग्रहणीय कृति की दिशा में अपना अभीष्ट देने के प्रयास किया है। निश्चित रूप से हम जैसे छंदों के अज्ञानियों के लिए संग्रह की महत्ता औरों से अधिक है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि ‘खोज लें हम सत्य’ सिर्फ शब्द, भाव या काव्य भर नहीं है जिसे शब्दों में ढालकर परोस दिया गया हो, बल्कि संग्रह की रचनाओं को देखने से महसूस होता है कि रचनाकार अपनी रचनाओं से आत्मावलोकन का खुला निमंत्रण दे रहा है। जीवन के यथार्थों के बीच आदर्श प्रस्तुत करने की ऊहापोह के उलझे मन को दिशा देने की एक सुंदर सार्थक कोशिश है। जो हिन्दी कविता की नाव के सहारे सत्य और नैतिकता की परंपरा को बढ़ाने का नैतिक कर्तव्य के जैसा लगता है। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि रचनाकार ने कवि के भावों को अनुभवों के से रंग-रोगन कर संग्रह को दस्तावेज सरीखा बनाने का प्रयास किया है, यही एक कलमकार की बढ़ी उपलब्धि है।
अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ विश्वास है कि अपने व्यक्तित्व के अनुरूप आप सतत अपनी साहित्यिक यात्रा में एक उच्च मानदंड स्थापित करने की दिशा में अविराम आगे बढ़ते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्तंभ बनेंगे।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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