ग़ज़ल
दिल में थी कड़वाहट लेकिन रिश्ते मुझे निभाना था
उनके दर से गुजर गया जो अपना एक जमाना था।
वह ताकतवर था शायद मुझसे मैं कमजोर कड़ी,
मेरी हिम्मत साहस सपना सबका सब बेगाना था।
राजनीति का कौशल शायद मुझमें कभी नहीं आया,
फिर भी जाने कैसे मैं भी जन-मन का दीवाना था।
उसके पीछे चलते-चलते मैंने कई लक्ष्य खोये,
जान सका ना कोई मुझको रिश्ता वही पुराना था।
जी कर देख लिया था आखिर जीने में मुश्किल कितनी,
उलझ गया संघर्ष समय का कैसा ताना-बाना था।
चलते-चलते जान न पाया कितना सफर तय किया मैंने,
बदल गई गतिविधियों सारी लेकिन दर्द पुराना था।
— वाई. वेद प्रकाश
