दोहा
अपने ही करने लगे, अब पीछे से वार।
मौका सदा तलाशते, घोंपें पीठ कटार।।
कभी नहीं हम जा सके, वादा किया हजार।
अब तो अंतिम बार ही, मिल आते इक बार।।
कोटा पूरण ही सही, मात-पिता दरकार।
बीबी का फरमान है, मिल आते इक बार।।
जीते जी पूछा नहीं, मोह जगा क्यों आज।
सारी दुनिया जानती, क्या है इसका राज।।
कहें मित्र यमराज जी, नहीं ठानिए रार।
जीते जी पूछा नहीं, अब करते तकरार।।
खाई इतनी चोट है, कितना करूंँ बखान।
दोषी किसको मैं कहूँ, नहीं लिया संज्ञान।।
लूट-खसोट में हैं फँसे, अपने नेता आज।
जनता इनको लग रही, दाद सरीखा खाज।।
धोखा देकर खा रहे, वो तो छप्पन भोग।
नहीं जानते आज ये, कल में होगा रोग।।
अब जमीर का भाव भी, गिरता जाता नित्य।
कहें मित्र यमराज जी, चुरा रहे साहित्य।।
माँ की ममता भव्यता, नहीं रहा क्यों जान।
मानव कलयुग दौर में, बनता क्यों नादान।।
सभी बताते स्वयं का, अपना भव्य चरित्र।
जानबूझ दिखला रहे, खुद का गंदा चित्र।।
मानवता के धर्म का, आप करो अपमान।
और सदा कहते फिरो, मैं मूरख अज्ञान।।
हास और परिहास का, अलग-अलग है रंग।
नहीं डालना चाहिए, हमें रंग में भंग।।
बचना हमको चाहिए, करने से परिहास।
सबकी अपनी सोच है, संग आस विश्वास।।
जब मौका दस्तूर हो, करो खूब परिहास।
आनंदित होंगे सभी, फैलेगा उल्लास।।
हम अपने गंतव्य का, रखें सदा ही ध्यान।
तभी पास हम एक दिन, होगा इसका भान।।
सबके अपने गंतव्य हैं, भले पास या दूर।
मिले किसी को प्रेम से, पर कोई मजबूर।।
चलते रहना आपके, जीवन का है काम।
मिलता है गंतव्य भी, संग नया आयाम।।
सब के सब हैं लालची, टपकाते हैं लार।
रग-रग में लालच भरा, आदत से लाचार।।
लालच जाता ही नहीं, होता रोग वियोग।
जो होते हैं जन्म से, लालच करते लोग।।
अपने-अपने स्वार्थ से, सबका है मंतव्य।
इसमें आखिर नया क्या, चलते हैं गंतव्य।।
शबरी कुटिया आ गए, रघुकुल नंदन राम।
खाकर जूठे बेर भी, रचा ललित आयाम।।
सबका दाता एक है, समझ रहा संसार।।
फिर जाने क्यों भटकता, बना हुआ लाचार।।
ग्राही बनकर हम भला, माँग रहे हैं भीख।
स्वाभिमान से क्यों नहीं, जीना लेते सीख।।
आप किसी से बाँटिए, अपने मन की बात।
घुट-घुटकर मत काटिए, अपनी सारी रात।।
मोदी करते आ रहे, अपने मन की बात।
कुछ लोगों को लग रहा, नाहक ही प्रतिघात।।
झुलस रहा है आदमी, गर्मी का आतंक।
पारा बढ़ता जा रहा, जीना हुआ कलंक।।
पशु-पक्षी इंसान सब, बहुत हुए बेहाल।
तपती धरती लग रही, जैसे भट्ठी लाल।।
बजती पायल मोहती, देती नव उल्लास।
नारी की गरिमा बढ़े, इसका मौन प्रयास।।
धरती / पृथ्वी दिवस
दिवस एक मना रहे, आप सभी हर वर्ष।
इससे ज्यादा चाहती, धरा कहाँ उत्कर्ष।।
धरती के इस साल के, हम सब जिम्मेदार।
निहित स्वार्थ विकास के, बनकर लंबरदार।।
धरा दिवस की आड़ में, नाहक पश्चाताप।
करते इसकी जो दशा, निश्चित है अभिशाप।।
जल से बनती है धरा, हरी भरी खुशहाल।
बड़ी जरूरत आज है, रखिए इसका ख्याल।।
हर प्राणी व्याकुल दिखे, धरती है बेचैन।
तकनीकों के जाल में, तोड़ रहा दम चैन।।
अभी अभी यमराज ने, खेला ऐसा दाँव।
हरियाली के संग में, दूर हो गई छाँव।।
धरती की क्या फिक्र है, जाना जब यमलोक।
पर्यावरण की आप भी, नाहक करते शोक।।
सबकी मंजिल एक है, हम हों या फिर।
जीवन जीते हैं सभी, करें पुण्य या पाप।।
सबकी मंजिल एक है, मत बनिए नादान।
बेवकूफी में क्यों भला, बाँट रहे भगवान।।
दिन प्रतिदिन ही कीजिए, सारे अच्छे काम।
सदा नियम पालन करें, प्रातःकाल व्यायाम।।
दिवस मनाने से भला, बढ़ता कितना भाव।
वर्ष शेष दिन देखिए, मिलता उसको घाव।।
वार का यारों काम है, बना रहे वो पूंँछ।
इसके बिन हर दिवस ही, जैसे लागे छूँछ।।
दिवा स्वप्न वो देखते, जो आलस में चूर।
करना जिनको कुछ नहीं, आदत से मजबूर।।
गाते मिलकर हम सभी, सुंदर मोहक गीत।
संग नृत्य उल्लास के, बनते दूजा मीत।।
हृदय बढ़े जब वेदना, देती गहरी टीस।
कोशिश कितनी भी करें, नहीं निकलती खीस।।
आज हृदय पत्थर हुए, देख रहे हम आप।
नजर लगी किसकी इसे, करते सब हैं पाप।।
भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचारी लोग की, होती जय-जयकार।
करते लूट-खसोट जो, गिरगिटिया व्यवहार।।
करते भ्रष्टाचार जो, बनते बड़का संत।
उनके आगे मौन हैं, ज्ञानी गुणी महंत।।
करें कमाई ऊपरी, मान रहे अधिकार।
बड़े गर्व से कह रहे, अपनी है सरकार।।
कुछ ऐसे भी लोग हैं, कभी न भरता पेट।
इनका मुख तो देखिए, जैसे दिल्ली गेट।।
घूसखोर की जिंदगी, रहती डाँवाडोल।
नहीं जानते स्वयं का, बिगड़ जाय भूगोल।।
यमराज
मम प्रियवर यमराज जी, निभा रहे हैं साथ।
जब से मैं बीमार हूँ, कसकर पकड़े हाथ।।
याराना यमराज से, देख चकित हैं। लोग।
कुछ हँसकर हैं कह रहे, बुरे कर्म का भोग।।
बहुत दिनों से तुम मुझे, दिखे नहीं यमराज।
तेरी भौजाई करे, याद बहुत ही आज।।
बिना किसी तकरार के, गया मित्र यमराज।
सोच रहा हूँ तभी से, क्या था बड़ा अकाज।।
पक्षाघाती रोग ने, दिया मुफ्त उपहार।
मित्र बने यमराज जी, डरती है सरकार।।
नहीं पता क्या आपको, मम प्रियवर यमराज।
मुश्किल के इस दौर में, करता मेरे काज।।
आज बहुत नाराज़ है, शुभचिंतक यमराज।
गुस्से में लड़कर गया, चाह रहा था ताज।।
