विकृत अस्पृश्यता व शिक्षा में भेदभाव की सत्यता
हम अवध क्षेत्र को केंद्र में रखकर भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक सौहार्द, सबके लिए समान शिक्षा व सभी के समान अवसर तथा व्यवहार पर जब दृष्टिपात करते हैं तो अवध का इतिहास ही प्रमाण है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत में जातीय वैमनस्य, सामाजिक संघर्ष व भेदभाव का स्थान नहीं था। अपवाद तो सभी जगह सम्भव हो सकता है लेकिन अपवाद को इतिहास या सत्य नहीं कहा जा सकता। हां मुगलों व अंग्रेजों का शासन भारत में स्थापित हो जाने के बाद भारतीय समाज में विघटन कर समाज को आपस में लड़ाने (फुट डालो और राज्य करो) के घिनौने उद्देश्य से भारत में जातीय वैमनस्य, घृणा, अस्पृश्यता को गलत प्रकार से मढ़ कर भारत में अपना स्थाई राज्य स्थापित करने का कुचक्र रच कर घिनौना पाप किया गया। जिसका परिणाम हुआ कि समाज में विकृति/ विभेद का समावेश हुआ। उपरोक्त पर सत्यता की कसौटी पर जब हम दृष्टि डालेंगे तो पाएंगे कि कि भारत में इस प्रकार की अस्पृश्यता अथवा ऊंच – नीच का विवाद भारत की सनातन परम्परा में कहीं नहीं दिखाई पड़ता है। इतिहास के कालक्रम में अवध क्षेत्र में हम ९ वीं शताब्दी से लेकर १४ वीं शताब्दी तक के शासकों के बारे में देखेंगे तो पाएंगे कि बहुतायत संख्या में जिन्हें आज राजनीतिक कारणों से निम्न जाति अथवा अस्पृश्य समाज का बताया जाता है उनका शासन रहा है। अवध के अंतर्गत लखनऊ में महाराज बिजली पासी, राजा लाखन पासी, वीरांगना ऊदा देवी, सीतापुर में महाराज छीता पासी, डलमऊ रायबरेली में डलदेव पासी, खैराबाद सीतापुर में महाराज खैरा पासी, बहराइच में महाराज सुहेलदेव, रानियां रायबरेली में महाराज माहे पासी, उन्नाव- हरदोई में महाराज सातन पासी इत्यादि शासक रहे हैं। इन सभी का कार्यकाल ९ वीं शताब्दी से लेकर १७ वीं शताब्दी तक रहा है। उपरोक्त सभी शासक न्याय प्रिय, वीर, उच्च शिक्षित, समाज में सर्वमान्य रहे हैं। सभी शासकों द्वारा जलाशय निर्माण, पाठशाला निर्माण, किला निर्माण, सड़क निर्माण, बागवानी, कुआं निर्माण, मंदिर निर्माण जैसे प्रजा के हित के लिए जो जो आवश्यक था सभी कार्य बिना भेद भाव के किए गए। यहां किसी के साथ कोई भेद भाव नहीं है। अब जब आज अस्पृश्यता की बात होती है राजनैतिक लोग यह आरोप लगाते हैं कि हमारे समाज को पढ़ने नहीं दिया गया, पानी नहीं पीने दिया गया, मन्दिर नहीं जाने दिया गया। बैठने नहीं दिया गया। तब यह सब बातें सत्य से कोसों दूर दिखाई पड़ती हैं। ऊपर लिखे सभी शासक जब आपके समाज से हैं तो आपको पढ़ने से किसने रोका, पानी पीने से किसने रोका, सवारी करने से किसने रोका, कुआं खोदने से किसने रोका, छुआ छूत का भाव किसने पैदा किया। इसके पीछे का कारण है कि हम कहीं न कहीं झूठीं बातों के शिकार हुए और हमारा समाज आपस में बंटा, वैमनस्य पैदा हुई और हम उन्नति में पीछे हो गए बाहर से आए आक्रांताओं ने ऐसा जाल बिछाया कि उसमें हम फंसे और आज तक निकल सकने में कायम नहीं हो पा रहे हैं। उल्टे हम हम अपने ही समाज के लोगों में ईर्ष्या कर रहे हैं जो सर्वथा अनुचित है। सनातन धर्म व हमारे समाज की हजारों वर्षों से चली आ रही समृद्ध संस्कृति सर्वसमावेशी है। हमारी समाज में सभी को बराबर का अधिकार प्राप्त था। सभी समाज के लोग गुरुकुल में एक सामन शिक्षा प्राप्त करते थे। जिसका उल्लेख लॉर्ड मैकाले भी फरवरी १८३५ में लंदन की संसद में दिए गए वक्तव्य में उल्लेख मिलता है। मैकाले कहता है कि यदि भारत में लम्बे समय तक शासन करना होगा तो हमें वहां के गुरुकुलों को , शिक्षा के केंद्र को बदलना व बन्द करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त भारत में मगध साम्राज्य, चोल साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य, गुप्त साम्राज्य भी इस बात का साक्षी है कि भारत में वर्षों तक इनका शासन रहा है जहां सभी वर्ग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को समान अधिकार प्राप्त थे। भारत वैभव सम्पन्न था। अतः आप अपनी झूठ द्वारा बनाई गई अभेद्य दीवार को तोड़कर बाहर निकलिए और समाज में प्रसन्नता के साथ आगे आएं साथ चलें।
— बाल भास्कर मिश्र
