कविता

मां

जिसकी छांव में पला और बड़ा हुआ
धीरे-धीरे अपने पांव पर खड़ा हुआ
बार बार करूं मैं उसका अभिनन्दन
ऐ मां तुझको मेरा शत-शत नमन।।

कितनी ही बार तुमने मुझे
विपदाओं से बचाया
कई बार असफल होने
‌ पर भी हौसला बढ़ाया।

आपकी उन्हीं सांत्वनाओं के बल पर
कुछ आपके दिखाए रास्ते पर चलकर
अंततः सफलता ने चूमे मेरे कदम
ऐ मां तुझको मेरा शत-शत नमन।।

न जाने कितनी बार भटके मेरे क़दम
लेकिन तुम मेरे साथ खड़ी थी हरदम
आज उसकी अहमियत जान पाया हूं
अब थोड़ा ख़ुद को पहचान पाया हूं।

अभी भी बहुत कुछ सीखना है बाकी
लेकिन अब कहां तुम्हारी दखलंदाजी
तेरी कृपा से चलती है मेरी कलम
ऐ मां तुझको मेरा शत-शत नमन।।

मातृ दिवस पर मन में कुछ भाव उमड़े
तेरी बदौलत हैं, इस मुकाम पर खड़े
होती जो तुम आज,तो कितना हर्षाती
मेरी हर सफलता पर आनंद मनाती।

पता है तुम्हारा आशीर्वाद है सिर पर
इसलिए नही भटकता मन इधर-उधर
सही राह पर पड़ते हैं मेरे स्वत: कदम
ऐ मां तुझको मेरा शत-शत नमन।।

मां जैसा विशाल शब्द अन्यत्र न दूजा
इसकी सेवा से बढ़कर नही कोई पूजा
मां के इर्द-गिर्द सब सुख डोलते हैं
ऐसा सिर्फ मैं नही, सब बोलते हैं।

भले ही स्वयं में वह दिखे दुखियारी
बच्चों के लिए मां है सर्व सुखकारी
उनकी सुरक्षा के करती वह हर जतन
ऐ मां तुझको मेरा शत-शत नमन।।

जिसकी छांव में पला और बड़ा हुआ
धीरे-धीरे अपने पांव पर खड़ा हुआ
बार बार करूं मैं उसका अभिनन्दन
ऐ मां तुझको मेरा शत-शत नमन।।

— नवल अग्रवाल

१० मई २०२६

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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