कविता
तेरा यूँ किनारा करना किसी जनाजे से कम नहीं,
अब इस टूटे दिल में कोई बाकी दम नहीं।
मुझसे कटकर तूने मुझे मौत के हवाले कर दिया,
इस अंधेरी तन्हाई से बड़ा अब कोई ग़म नहीं।
मेरी मोहब्बत का तूने क्या खूब सिला दिया है,
खामोशी का ज़हर तूने मुझे पिला दिया है।
जिस्म तो हाज़िर है पर रूह कहीं खो चुकी है,
तूने जीते जी मुझे राख में मिला दिया है।
तेरी ये बेदिली ही अब मेरी आखिरी मंज़िल है…
तेरा यूँ मुँह मोड़ना किसी क़यामत से कम नहीं,
अब इस अधमरी जान में कोई बाकी दम नहीं,
नज़रों से गिराकर तूने मौत के साये में कर दिया,
इस बेबसी के ज़हर से बड़ा अब कोई ग़म नहीं,
मेरी चाहत का तूने क्या अजीब सिला दिया है,
सिसकियों का समंदर मेरी आँखों में सजा दिया है,
साँसें तो बोझ हैं, रूह तो कब की छोड़ चुकी,
तूने जीते जी मुझे जीते जी ही दफ़ना दिया है,
तेरी ये बेरुखी ही अब मेरी आखिरी मंज़िल है
— हेमंत सिंह कुशवाह
