सामने ज़ोया खड़ी थी
शाम के साए ज़रा गहरे हो चुके थे। रेलवे स्टेशन के मुसाफ़िरख़ाने में बत्तियों की मद्धम रोशनी फैली हुई थी। इस रौनक़-शनासा माहौल में भी अमान एक कोने में बैठा ज़िंदगी की बिसात पर अपनी शिक़स्त का सोग मना रहा था। उसकी ख़ांसती हुई छाती, ज़र्द चेहरा और उँगलियों के दरमियान सुलगता सिगरेट का धुआँ गवाही दे रहे थे कि अंदर कुछ बुरी तरह टूट चुका है।
जब-जब वह सिगरेट का कश खींचता, धुएं के छल्लों में माज़ी की दास्तानें मुजस्सम होकर उसके सामने आ खड़ी होती।
अमान को याद आया वह दौर, जब कॉलेज के नीम के पेड़ों के साए में उसने ज़ोया का हाथ थामा था। ज़ोया—जिसके लहजे में मखमली नफ़ासत थी, जो अदब की महफ़िलों की रौनक़ थी। शादी के बाद ज़ोया ने अमान के घर को अपने सलीक़े, मोहब्बत और ख़ुलूस से एक मुकम्मल नज़्म बना दिया था। अमान के दफ़्तर से लौटने से पहले वह चमेली के फूलों से कमरा महका देती, और जब अमान थका-हारा आता, तो ज़ोया के हाथ की बनी कड़क चाय और उसकी मद्दम सी मुस्कुराहट हर थकान हर लेती थी। अमान उस दौर में ख़ुद को दुनिया का सबसे ख़ुश-नसीब इंसान समझता था।
मगर फिर अमान की नीयत डगमगाई। दफ़्तर में रुख़साना की आमद हुई। रुख़साना, जिसका हुस्न रवायती नहीं बल्कि जदीद और पुर-कशिश था। उसकी महफ़िल-आराई, उसका कहकहा और ज़ोया के बरअक्स उसकी आज़ाद-ख़्याली ने अमान के ज़हन पर जादू कर दिया।
अमान अपनी वफ़ादार बीवी की आँखों में उठते सवालात से नज़रे चुराने लगा। वह जो शाम ढलने से पहले घर लौट आता था, अब आधी-आधी रात तक रुख़साना के साथ होटलों और तन्हाइयों के मतरूफ़ (मशगूल) रहने लगा। ज़ोया ने हर मुमकिन कोशिश की कि घर की लाज बची रहे, उसने अमान की बेरुखी को भी सब्र के घूंट की तरह पिया। मगर अमान की अंधाधुंध करगुज़ारियाँ थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
एक रोज़ जब ज़ोया ने अमान को बाज़ार के एक चौराहे पर रुख़साना की ज़ल्फ़ों के साए में मुस्कुराते देखा, तो उसके सब्र का पैमाना छलक गया। अमान ने उस दिन ज़ोया के माथे के झुर्रियों को नज़रअंदाज़ करके रुख़साना का हाथ थाम लिया और ज़ोया को उसी के हाल पर छोड़ दिया।
अमान को गुमान था कि उसने नई जन्नत पा ली है, मगर रुख़साना वफ़ा की ज़मीन पर पैर टिकाने वाली औरत न थी। जैसे ही अमान की जेब ख़ाली हुई और उसकी सेहत ने दगा दिया, रुख़साना अपनी ज़ाहिरी चमक-दमक समेटकर किसी और अमीर राही के हमराह रवाना हो गई। अमान को बीच भँवर में छोड़कर वह ऐसी गई कि अमान के हिस्से में सिर्फ़ ज़िल्लत, पछतावा और यह तपेदिक (टी बी)की बीमारी आई। यही उसकी करगुज़ारियों का कुल माहासिल था।
तभी मुसाफ़िरख़ाने की फिज़ा में इत्र-ए-हिना की वही जानी-पहचानी ख़ुशबू तैरी। अमान ने चौंककर निगाह उठाई, तो सामने ज़ोया खड़ी थी। वही सादगी, वही बा-वक़ार शख़्सियत।
“आदाब, अमान साहब!” ज़ोया ने अपनी मख़सूस संजीदगी और ख़ुलूस-ए-बयान के साथ कहा, “ख़ैरियत तो है? इन धुओं के बादलों में अपनी सेहत को यूं ज़ामिन रखना कहां की दानिशमंदी है? सुना था आप रुख़साना साहिबा के हमराह किसी नए सफ़र पर हैं?”
अमान की ज़बान जैसे तालू से चिपक गई। माज़ी के गुनाह उसकी आँखों के सामने तैर गए। वह सिर्फ़ इतना कह पाया, “ज़ोया… तुम? मैं… मैं बस इस ज़िंदगी के बोझ से मुसाफ़िर बन गया हूँ। रुख़साना की दास्तान तो कब की ख़ाक हो चुकी।”
ज़ोया ने मुस्कुराकर उसकी तल्ख़ी को समेटा, “सफ़र तो बहरहाल कटना ही है। हमारी गाड़ी भी आ चुका है। आइए, अगर गवारा हो तो यह मुसाफ़त साथ तय कर लें।” अमान को लगा जैसे सूखी माटी पर सावन की पहली बूंद गिरी हो। ज़ोया ने बड़े अदब से उसका भारी सूटकेस उठाया और उसे सहारा देकर डिब्बे की तरफ़ ले गई। अमान को गुमान हुआ कि शायद ज़ोया अब भी उसे चाहती है, शायद माज़ी की तल्ख़ियाँ धुल गई हैं।
पूरे सफ़र में ज़ोया निहायत सलीक़े से बात करती रही, जैसे ज़बान से फूल झड़ रहे हों। मगर उन फूलों में वह पुरानी महक न थी, बल्कि एक मुअद्देबाना और तल्ख़ दूरी थी।
अगले बड़े स्टेशन पर गाड़ी रुकी। दोनों नीचे उतर आए। अमान का दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसने हिम्मत जुटाकर कहा, “ज़ोया, मेरी ख़ताओं की माफ़ी तो मुमकिन नहीं, मगर क्या इस सफ़र की कोई मंज़िल हमारे सामने है? क्या तुम अकेली हो?”
ज़ोया रुकी। उसने पलटकर अमान की आँखों में देखा, जहाँ उसकी गुज़री हुई बद-अमलियों का अक्स था। ज़ोया के होठों पर एक पुर-असरार मगर मुतमइन मुस्कुराहट उभरी।
उसने निहायत धीमे और पुर-वज़ारत लहजे में कहा, “अमान साहब, इंसान जब एक मर्तबा कश्ती जला देता है, तो साहिल की तमन्ना लाहाशिल हो जाती है। मैं अकेली नहीं हूँ। इस शहर में मेरी हस्ती किसी और के दम से मुनव्वर है।”
तभी पीछे से एक बेहद संजीदा आवाज़ उभरी, जिसमें एक रसीलापन था।
“मंज़र-ए-शाम ख़ूबसूरत है ज़ोया साहिबा, मगर आपकी आमद ने इसे मज़ीद पुर-लुत्फ़ बना दिया। माफ़ कीजिएगा, नशिस्त की मसरूफ़ियत में ज़रा देर हो गई।”
अमान ने चौंककर देखा। सामने शेरवानी पहने, चेहरे पर बेइंतहा शराफ़त और आँखों में एक अजब सी चमक लिए एक शख़्स खड़ा था। यह दानिश साहब थे।शहर के मशहूर और मारूफ़ अदीब और उर्दू अदब के उस्ताद।
ज़ोया ने आगे बढ़कर दानिश साहब को तस्लीम किया और फ़िर अमान की तरफ़ मुतवज्जेह होकर, निहायत तहज़ीब और बेतकल्लुफ़ी के आमेज़ेश से कहा।
“दानिश साहब, इनसे मिलिए, यह अमान साहब हैं… मेरे माज़ी का एक गुज़रा हुआ पन्ना। और अमान साहब… यह दानिश साहब हैं, मेरे शौहर, मेरे साएबान और मेरी ग़ज़लों के मुसन्निफ़।”
यह सुनना था कि अमान के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह जिसे अपनी माफ़ी और वापसी का ज़रिया समझ रहा था, वह तो किसी और के आंगन की चमेली बन चुकी थी। उसकी पुरानी करगुज़ारियों का इंसाफ़ आज इस प्लेटफ़ॉर्म पर मुकम्मल हो चुका था।
दानिश साहब ने आगे बढ़कर अमान को सलाम किया और बड़े शफ़क़त भरे लहजे में कहा, “अस्सलाम-अलैकुम अमान साहब। आपकी गुज़श्ता तशरीफ़-आवरी का ज़िक्र अक्सर ज़ोया के अफ़सानों में अदबी तौर पर मिलता है। आपसे मिलकर दिली मसर्रत हुई।”
अमान ने कांपते हुए हाथ उठाए, मगर लफ़्ज़ उसके हलक़ में घुट कर रह गए। दानिश साहब की कामयाबी, उनका अदब और ज़ोया के चेहरे का सुक़ून अमान के वजूद को अंदर तक झंझोड़ गया।
दानिश साहब ने निहायत अदब से ज़ोया का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “चलिए ज़ोया साहिबा, घर पर महफ़िल-ए-मुशायरा मुंतज़िर है।”
ज़ोया ने अमान की तरफ़ आख़िरी मर्तबा देखा,उस निगाह में न शिक़वा था, न मलाल, बस एक ख़ामोश अलविदा था। दोनों स्टेशन से बाहर खड़ी एक आलीशान सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ बढ़ गए। दानिश साहब ने अदब से गाड़ी का दरवाज़ा खोला, ज़ोया तशरीफ़ फ़रमा हुई, और गाड़ी मद्धम आवाज़ के साथ मुसाफ़िरख़ाने की हद से दूर निकल गई।
स्टेशन के बेंच पर सिर्फ़ अमान रह गया था। हवा में अब भी सिगरेट का धुआँ था, मगर अब उस धुएं में ज़ोया का अक्स नहीं, बल्कि अमान की अपनी तन्हाई का दर्द था। एक ऐसा मुसाफ़िर जिसने अपनी करगुज़ारियों से अपनी ही जन्नत खो दी थी।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज’
