रिश्तों की अलमारी
पूछती हूं तुम से खता क्या थी हमारी ,
ढूंढती रही मैं रिश्तों की वो अलमारी ।
कहीं खो गयी है वो चाबी जिसमें थी ,
रिश्तों की वो महकती फुलवारी।।
पूछती हूं तुम से खता क्या थी हमारी
ढूंढती रही मैं रिश्तों की वो अलमारी।।
आंखों में छा गए हैं मेघों के अन्धेरे साये,
जी रहे हैं ऐसे जैसे कि हम हो गए पराये।
जुगनुओं की रोशनी से बगिया जो चमकती थी,
आज़ भंवरों की गुनगुनाहट भी किसी को न भाये।।
पूछती हूं तुम से खता क्या थी हमारी,
ढूंढती रही मैं रिश्तों की वो अलमारी।।
राह चलते चलते वो सपनों की महफ़िल थी
परछाइयों के पन्नों को पलटती जा रही थी
सूखे हुए अश्कों में स्मृतियों की नमी है
अतीत की खिड़कियों को खोलती जा रही थी ।।
पूछती हूं तुम से खता क्या थी हमारी,
ढूंढती रही मैं रिश्तों की वो अलमारी।
सांसों में घुल गई है मिट्टी की खुशबू हमारी,
जिसमें गूंजती रही है मुरली की धुन तुम्हारी।
सहस्त्र किरणों से भरी वो अद्भुत चौखट थी,
अब तो कलम को भी स्याही पड़ रही है भारी।।
पूछती हूं तुम से खता क्या थी हमारी।
ढूंढती रही मैं रिश्तों की वो अलमारी।।
— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ
