कॉलेज के वो दिन
कॉलेज का पहला दिन आज भी याद है। नए चेहरे, नई कक्षाएँ और दिल में अनगिनत सपने। शुरुआत में सब अजनबी थे, लेकिन धीरे-धीरे वही लोग ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गए।
हर सुबह क्लास के लिए निकलना, दोस्तों के साथ कैंटीन में घंटों बैठना, चाय की एक-एक चुस्की के साथ बड़े-बड़े सपने देखना—यही हमारी दुनिया थी। कभी लेक्चर अटेंड करते, तो कभी दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक में पूरा दिन निकल जाता।
परीक्षा के दिनों में रात-रात भर पढ़ना, और फिर सुबह दोस्तों से कहना, “कुछ नहीं पढ़ा”, जबकि सबके पास अपनी-अपनी तैयारी होती थी। रिज़ल्ट का डर भी था, लेकिन दोस्तों का साथ हर डर को छोटा कर देता था।
कॉलेज ने सिर्फ़ किताबों का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि लोगों को समझना, रिश्ते निभाना, मुश्किल समय में हिम्मत रखना और अपने पैरों पर खड़ा होना भी सिखाया।
फिर एक दिन विदाई का समय आ गया। आख़िरी बार क्लासरूम को देखा, कैंटीन की ओर नज़र गई, और एहसास हुआ कि अब ये पल सिर्फ़ यादों में रह जाएँगे।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि कॉलेज ने मुझे सिर्फ़ एक डिग्री नहीं दी, बल्कि ऐसी यादें दीं जो पूरी ज़िंदगी मेरे साथ चलेंगी।
कुछ सफ़र मंज़िल तक पहुँचकर ख़त्म हो जाते हैं, लेकिन कॉलेज का सफ़र यादों में हमेशा ज़िंदा रहता है।
ज़िंदगी एक ट्रेन है जिसका टिकट हमें बिना पूछे मिल जाता है।जन्म उसका पहला स्टेशन होता है, और आख़िरी स्टेशन का नाम किसी को पहले से नहीं पता।
मेरा नाम धर्मेन्द्र शर्मा है। मैं भी इस ट्रेन का एक साधारण मुसाफ़िर हूँ। कभी खिड़की वाली सीट मिली, कभी दरवाज़े पर खड़े होकर सफ़र करना पड़ा। कभी भीड़ ने धक्का दिया, तो कभी किसी अजनबी ने हाथ पकड़कर गिरने से बचा लिया।
बचपन का स्टेशन सबसे सुंदर था। वहाँ खिलौने थे, मासूमियत थी और माँ की गोद सबसे सुरक्षित सीट थी। फिर स्कूल आया, जहाँ दोस्त मिले। कुछ अगले स्टेशन पर उतर गए, कुछ आज भी यादों के डिब्बे में बैठे हैं।
कॉलेज का स्टेशन सबसे शोर भरा था। वहीं सपनों ने पहली बार आँखें खोलीं। कुछ अपने मिले, कुछ पराए हो गए। किसी से दिल भी लगा, लेकिन वह भी एक दिन अपने स्टेशन पर उतर गया। मैं हाथ हिलाता रह गया, और ट्रेन आगे बढ़ती रही।
उस दिन समझ आया कि इस सफ़र में कोई हमेशा साथ नहीं चलता। हर मुसाफ़िर का अपना स्टेशन होता है।
रास्ते में कई सुरंगें भी आईं। अँधेरा इतना था कि लगा अब रोशनी नहीं मिलेगी। लेकिन हर सुरंग के बाद सूरज मेरा इंतज़ार करता मिला। तब जाना कि मुश्किलें पटरियाँ बदल सकती हैं, मंज़िल नहीं।
आज भी मेरी ट्रेन चल रही है। न जाने आगे कौन-सा स्टेशन आएगा, कौन मिलेगा, कौन बिछड़ेगा। लेकिन अब डर नहीं लगता, क्योंकि मैंने सीख लिया है—
ट्रेन का काम चलना है,और मुसाफ़िर का काम मुस्कुराते हुए सफ़र तय करना।
अगर मेरी कहानी किसी की आँखों में आँसू ला दे, किसी टूटे हुए इंसान को हिम्मत दे दे, तो समझूँगा कि मेरा सफ़र बेकार नहीं गया।
क्योंकि ज़िंदगी मंज़िल का नाम नहीं,चलते रहने का नाम है.
— धर्मेन्द्र शर्मा
