अनेक ख्वाहिशों की नाव पर सवार नहीं हो
मन शांत रहे
ख्वाहिशों का भार न लो
नभ मुस्काए आज
नाव हल्की रखो
सागर पथ सरल हो जाए
मौन गीत गाए
फूल स्वयं खिलते
ऋतु अपना रंग बदलती
धीरज फल देता
चाँद दूर रहकर
रातों को उजियारा दे
मन दीप जलाए
बादल आते हैं
फिर नभ में खो जाते हैं
क्षण को जी लो तुम
नदी बहती है
पत्थर भी राह छोड़ते
प्रेम राह बनाता
सपनों को रखो
पर उनमें मत बंधो तुम
पंख खुले रखना
इच्छा कम होगी
जीवन मधुर बनेगा
शांति संग चलना
— डॉ. अशोक
