प्रेम ही जीने की आस
दिव्य प्रेम राधा का,
भक्ति प्रेम मीरा का।
बाजीराव मस्तानी,
प्रेम हीर रांझा का।।
प्रेम के रूप अनेक,
माटी से प्रेम करें हलधर।
राष्ट्र प्रेम की अद्भुत धधक,
हमारे शूर वीर जवानों में।।
आजकल चलन है चला,
आभासी प्रेम का जाल बुना।
कभी लोहगड़ से ढकेला,
कभी टुकड़े कर फेंका।।
मातु पिता का प्रेम,
गुरु-शिष्य का आदर प्रेम।
परम ईश से पावन प्रेम,
भक्ति रस में डूबा प्रेम।।
अमृतपान मातु का,
आँचल स्नेहिल ठाँव।
कठोर भले हो पिता,
चट्टान-सी संबल ठाँव।।
जीवन है क्षणिक बुलबुला,
हरपल हो प्रेम से उजला।
प्रेम ही सुन्दर सत्य है,
प्रेम ही जीने की आस।।
