मुक्तक/दोहा

मुक्तक

दर्द दिल में छिपाना सीख लिया है,
मैनें अब मुस्कुराना सीख लिया है।
लोग कुरदते जख्म, देखने के बहाने,
खुद मरहम लगाना, सीख लिया है।

दर्द की बातें किसी को बताता नहीं हूँ,
गर्दिश के दिनों में, कहीं जाता नहीं हूँ।
देखा है ज़माने को, मुश्किल में बदलते,
शर्मिंदगी का अहसास कराता नहीं हूँ।

निज घर में भूखा रहकर भी, खुश रहता हूँ,
खाना खाकर आया, अपनों को कह देता हूँ।
सफलता में साथ, निष्फलता में कसें तंज,
कैसे हो! के उत्तर, परमानंद में कह देता हूँ।

— अ कीर्तिवर्द्धन

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