मेढकी मेढक से बोली
मेढकी एक दिन मेढक से बोली,
तुम ले चलो हमको नदी किनारे।
ये गर्मी का मौसम जो आया है,
नहाना चाहती हूँ मैं नदी किनारे।
अच्छी सी हरी-हरी साड़ी लाओ,
और लाल-लाल चूड़ियाँ भी लाओ।
कंगन और सब गहने ले आओ,
आओ मेरे राजा तुम भी नहाओ।
सजकर अपने मायके जाऊंगी,
मम्मी-पापा से मिलने जाऊंगी।
ढेर सारे पैसों की गड्डी दे दो,
बच्चों के लिए मिठाई ले जाऊंगी।
मेढक बोला-मेरा तुम चूना लगाओगी,
मंहगाई में तुम रोज मायके जाओगी।
घर का खरचा इतना ज्यादा है मेढकी,
मायके जाकर तुम गुलछर्रे उड़ाओगी।
मेढक की बात सुनकर बेचारी,
सुबक-सुबककर वह खूब रोई।
मेढक ने मेढकी को खूब मनाया,
धीरे से मेढकी तब मुस्काई।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
