कविता

कभी रहे जो सात्विक दीक्षित

कभी रहे जो सात्विक दीक्षित,
पद पाकर कर सकते पीड़ित;
पाकर प्रभुता और महत्ता,
वे भी हो सकते आक्रांता!

हर पल प्रकृति बदलती चलती,
सृष्टि कहाँ वैसी ही रहती;
पाण्डव कल कौरव हो सकते,
नये मुकुल हर शाखा उगते!

आपेक्षिक है जगत् जागरण,
हटते जाते प्रकृति आवरण;
कितने आयामों के विनिमय,
उद्भासित हो करते थिरकन!

अंधकार हर परत रहा है,
नव प्रभात नित उझक रहा है;
हर आत्मा में ब्रह्म रमा है,
रूप बदल आलोक प्रबल है!

हर पत्ता सत्ता आता है,
नाच कूद कर चल देता है;
‘मधु’ ब्रह्माण्ड प्रभु प्रतिपादित,
हर अंकुर उनके उर उमगत!

✍🏻 डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’

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