कविता

बुढ़ऊ की थ्योरी

मैं कहीं जा रहा था,
रास्ते में एक जगह रुका।
तभी एक बुढ़ऊ मुझसे टकराया,
सत्ताधारी नेता का गुणगान सुनाया।

बोला—
“सच्चा नेता वही कहलाए,
जो लोगों को खूब बरगलाए।
एक मुद्दा सुलझने से पहले,
दूजे मुद्दे में सबको उलझाए।

अपने आपको ऐसा दिखाए,
जैसे मेहनतकश बस वही है,
उसके जैसा दूजा कोई नहीं है।

जिस तरह नई दुल्हन,
काम कम करती, चूड़ियाँ ज़्यादा खनकाती है,
ताकि पड़ोसियों को लगे…
बहुत मेहनत कर दिखाती है।

बस नेता का हाल भी वैसा है,
बैठे-बिठाए पैसा ही पैसा है।

और हाँ, अंधभक्त तो रहना चाहिए,
बबूल को भी फलदार वृक्ष कहना चाहिए।
मुँह से बकलोली ज़रूर होना चाहिए,
देशहित में नेता को सोना चाहिए।

नींद को भी अठारह-बीस घंटे का काम बता देंगे,
और कहेंगे यहीं से देश में
अमूलचूल परिवर्तन ला देंगे,

इतना सुन मैं बेहोश होते-होते बचा,
बुढ़ऊ की थ्योरी सुनकर
मैं देर तक खूब हंसा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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