जाति पाति
ढहा दो इन भेद की दीवारों को
जिन्होंने बाँट रखा है आपस में इंसानों को
यह भेद बनाये किसने
मालिक ने तो बनाया था आदमी
न हिन्दू न मुस्लिम सिख न कोई ईसाई
यह जाति पाति की दीवारे
आ ख़ड़ी हुईं फिर कहाँ से
दूर कर दिया जिसने इंसा को इंसा से
कर्म के कारण जो बनी अगर यह दीवारे
तो अब कर्म बदल गए इक दूजे के
मोची काम कर रहा ऑफिस में
लाला दुकान खोले जूतों की
अब तो फिर ढह जानी चाहिए
जाति पाति की यह दीवारे
चारों तरफ इंसान नज़र आने चाहिए
