कविता

ख़ामोशी का फ़ैसला

तोड़े हैं गलतफहमियों ने मेरे सारे रिश्ते,
जिन्हें मैं समझता था फरिश्ते,
अब पता नहीं उन सबको
खुन्नस किस बात की थी,
शायद कभी उनके दिल में
नहीं कदर मेरे जज्बात की थी,

जिनकी जबान लड़खड़ाती थी
आते ही सामने मेरे,
आज बदलते वक्त के साथ
उनके तेवर बदल गए,
उन जबानों से निकले आग से
झुलसा है मेरा तनबदन,
मेरे खामोश भरोसे का
सरेआम कत्ल कर गए,

जो कभी साया बनकर साथ थे,
आज वो अजनबी से भी बदतर हैं,
हर सफाई यहाँ अब एक गुनाह है,
और सुनने वाले सब पत्थर हैं,

इसलिए,
अब मैंने भी बेजरूरत सफाइयां
देने की जरूरत नहीं समझता,
जो मुझे समझ न सका,
उसे समझाने की जहमत नहीं करता,
अब मैंने खुद को समेट लिया है,
अपनी खामोशी की चादर में,
क्योंकि हर रिश्ते की भीख मांगना
अब मेरी फितरत में नहीं।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554