ग़ज़ल
अब हमें तो मुस्कुराना आ गया।
आज अपना ग़म भुलाना आ गया।
गा रहे थे प्रीत के ही गीत हम।
याद वो मंजर सुहाना आ गया।।
तोड़ जाती है जुदाई देख ले।
देख आँसू ही बहाना आ गया।।
वीर दुश्मन को ठिकाने दें लगा।
अब उन्हें हद का सहारा भा गया।।
अब लगन ही देश की हमको लगी।
आज खुद को ही मिटाना आ गया।।
सुन अगर तुम आ यहाँ जाओ क्या करें।
आइना हमको दिखाना आ गया।।
वो बहारें याद मुझको आ रहीं।
अब उन्हें देखो भुलाना आ गया।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
