गीतिका/ग़ज़ल

गुरुदेव

सबको सदा गुरुदेव देते ज्ञान हैं।
कर दूर अँधियारा दिलाते मान हैं ।।

सबसे करूँ पहले नमन गुरुदेव को।
अपने लिए वह तो सदृश भगवान हैं।।

छूते दिखे वह उच्चतम उस स्थान को।
पाना जिसे विद्वान हित इक शान है ।।

गुरुजी हमारे ज्ञान के भंडार सम ।
आशीष से हम लोग का कल्यान है।।

हर इक विधा में वह निपुण विख्यात ये।
साहित्य में बसता लगे गुरु प्रान है।।

अर्चन करें वन्दन करें गुरुदेव का।
साहित्य के मनहर सुघर सुर तान है।।

सूरज सदृश फैले उजाला हर कहीं ।
आशीष पायें ज्ञान का जो खान है।।

जितेन्द्र कहते नाम यह गुरुदेव का ।
होता मुदित आशीष पाकर जान है ।।

— डाॅ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’

डॉ. सरला सिंह स्निग्धा

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