कथाकार प्रेमचंद
आज भी
मजदूर बनने को
विवश है कृषक वर्ग ।
उनका सारा स्वाभिमान
पूँजीपतियों की
जेबों में बंद है
बाहर निकलने को
आतुर है ।
छटपटाहट है,
कसक है ,
परंतु, बाहर निकलना
मुश्किल है।
क्योंकि, बदले में
उन्हें मिला है
वह ऋण ,
जो कभी चुक
नहीं सकता ।
आज भी,
आजादी मिलने के बाद भी
संपूर्ण मानव जाति में
सुगबुगाहट है ।
रोजी-रोटी की,
परतंत्रता की
कसमसाहट है ।
क्या यही है
वह आजाद भारत
जो पटेल एवं लाजपत राय
के सत्कर्मों का
पुण्य प्रताप है ?
क्या यही है
वह आजादी?
जो आजाद और बोस के
संयुक्त बल का प्रकाश है ?
नहीं ! यह नहीं है
संपूर्ण आज़ादी ।
यह आजादी आधी है ।
प्रेमचंद तुमने दिलाई
है आजादी
प्रेमचंद, तुमने सजाई है
यह वादी
होरी, हलकू,घासी की
गाथा लिखी है ।
धनिया, कमला, निर्मला
की व्यथा कही है ।
जाति प्रथा,
वर्ग भेद पर
प्रहार किया है ।
ऋण ग्रस्तता ,
पाखंड का
मुँह तोड़ दिया है ।
मानवता उद्धार
आपका धर्म था
दलितों का सत्कार
आपका कर्म था ।
आप ही स्वतंत्रता सेनानी
हो, साहित्य के ।
आप ही अग्रदूत हो
मुक्ति के ।
वंदनीय है ,
आपका साहित्य सृजन
शत-शत नमन ।
आपको शत-शत नमन ।
— बृजबाला दौलतानी
