राजनीति

देहली के छात्र आंदोलन की अनुचित भाषा 

देश की राजधानी देहली में छात्र आंदोलन ने बहुत से सवाल खड़े कर दिए हैं। बात आंदोलन के पक्ष या विपक्ष की नहीं है। दोनों के पक्षों के अपने २ तर्क हो सकते हैं। बात आंदोलन की नहीं है। देश की राजनीति को छात्रों ने कई बार प्रभावित किया है। युवा छात्र  देश का भविष्य बताये जाते हैं। छात्र के आंदोलन को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता है। आपात काल से पूर्व छात्र आंदोलन ने देश की राजनितिक परिदृश्य के परिवर्तन ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यह बात अलग है कि उस आंदोलन को वरिष्ठ जनों ने ऐसा पलीता लगाया था की देश की जनता उस से निराश हो गई थी।  इसी प्रकार असम के छात्रों ने भी देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अस्तु छात्र आंदोलन को किसी भी प्रकार नकारा तो नहीं जा सकता है। 

साथ ही छात्र आंदोलन की सफलता की निश्चितता के कारण विपक्ष अपनी  स्वार्थ पूर्ति के लिए उन के भरपूर समर्थन करता है। उसे यह राजनीतिक दल होने के करण अधिकार भी है। इस में भी कुछ नहीं कहा जा सकता है कि छात्र आंदोलन का कौन विरोध करे और कौन समर्थन करे। इस में किसी को कुछ कहने का अधिकार नहीं है। निश्चित आप अपने तर्क पक्ष या विपक्ष में देने को स्वतंत्र हैं। 

परन्तु बात इस आंदोलन से उपजी भाषा का है जिस ने सब मर्यादाओं को लांघ कर अपनी दूषित मानसिकता को गर्व से प्रकट किया। अश्लीलता अभद्रता व्यक्तिगत शत्रुता हिंसा और असभ्यता का इस आंदोलन की भाषा में ऐसे प्रकट हुआ जैसे यह देश के युवा का चरित्र हो। बेशक यह भाषा देश की युवा की भाषा नहीं थी यह निश्चित कुछ उच्छृंखल छात्रों की भाषा थी। पर वहां उपस्थित थी। जो देश के साधारण नागरिक से ले कर परिवार समाज और राजनीति सभी के लिए अत्यधिक विचारणीय प्रश्न है। 

इस भाषा ने आम नागरिक को स्वाभाविक उद्वेलित किया है। बुद्धिजीवियों ने कहीं २ विरोध प्रकट किया है। परन्तु आज की राजनीति इतनी गिर गई कि जिस का सोच कर भविष्य की चिंता सभी को सताने लगी है। परन्तु विपक्ष की दूषित मानसिकता भी इस समय  आसानी से देखी जा सकती है। परन्तु अपने राजनितिक लाभ के कारण विपक्ष ने इस का किसी भी प्रकार से विरोध नहीं किया उल्टा उसे बढ़ाने में अपना भरपूर सहयोग किया। तथा अराजकता जैसी स्थिति बनाने में भी अपना पूर्ण सहयोग किया। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि इस तरह भी मानसिकता निरंतर बढ़ रही है और जो मूल्य राजनीती में अटल बिहारी बाजपेई ,राम मनोहर लोहोया या दुसरे नेताओं ने स्थापित किये  थे उन का विनाश हम अपने सामने होते देख रहे हैं। 

बात दूसरी और चली जाएगी इस लिए हम अपने मूल विषय पर आते हैं कि क्या आज मिल कर बुद्दिजीवियों परिवार को और समाज को ऐसी अभद्रता अश्लीलता और हिंसक भाषा के निषेध पर विचार करना ही होगा। नहीं तो भारत को इस से  भविष्य में अत्याधिक हानि उठानी पड़ेगी ही यह निश्चित है। इस में केवल परिवार और समाज ही नहीं राजनेताओं की भाषा और उस होने वाली बहस पर लगाम तो लगानी ही होगी नहीं तो बहुत देर हो चुकेगी और हम सभी इस के उत्तरदायित्व से नहीं बच सकेंगे और न ही हमारे पास कोई बहाना ही बचेगा। परन्तु प्रसन्नता का यह विषय भी है कि कहीं २ ऐसी मानसिकता की भाषा का सामर्थ्यानुसार विरोध युवा जन ने प्रारम्भ कर दिया है। 

— डॉ. वेद व्यथित

*डॉ. वेद व्यथित

ख्यात नाम : डॉ. वेद व्यथित नाम : वेद प्रकाश शर्मा जन्म तिथि : अप्रैल 9,1956 शिक्षा : एम्० ए० (हिंदी ),पी एच ० डी० शोध का विषय "नागार्जुन के साहित्य में राजनीतिक चेतना मेरठ विश्व विद्यालय मेरठ वर्तमान पता : अनुकम्पा -1577 सेक्टर -3 ,फरीदाबाद -121004 फोन नम्बर : 0129-2302834 , 09868842688 ईमेल : dr.vedvyathit@gmail.com Blog : http://sahiytasrajakved.blogspot.com सम्प्रति : अध्यक्ष - भारतीय साहित्यकार संघ (पंजी ) संयोजक - सामाजिक न्याय मंच (पंजी) उपाध्यक्ष - हम कलम साहित्यिक संस्था (पंजी ) शोध सहायक - अंतर्राष्ट्रीय पुनर्जन्म एवं मृत्योपरांत जीवन शोध केंद्र इंदौर ,भारत परामर्श दाता - समवेत सुमन ग्रन्थ माला सलाहकार - हिमालय और हिंदुस्तान विशेष प्रतिनिधि - कल्पान्त सम्पादकीय परामर्श - ब्रह्म चेतना सम्पादकीय सलाहकार - लोक पुकार साप्ताहिक पत्र संस्थापक सदस्य - अखिल भारतीय साहित्य परिषद ,हरियाणा प्रान्त पूर्व सम्पादक - चरू (साहित्यिक पत्र ) पूर्व प्रांतीय सन्गठन मंत्री - अखिल भारतीय साहित्य परिषद परामर्श दाता : www.mohantimes .com (इ पत्रिका ) जापानी हिंदी कवि सम्मेलनों में सहभागिता अनुवाद : जापानी,रुसी ,फ्रेंच , नेपाली तथा पंजाबी भाषा में रचनाओं का अनुवाद हो चुका है प्रकाशन : मधुरिमा (काव्य नाटक ) १९८४ आखिर वह क्या करे (उपन्यास )१९९६ बीत गये वे पल (संस्मरण )२००२ आधुनिक हिंदी साहित्य में नागार्जुन (आलोचना )२००७ भारत में जातीय साम्प्रदायिकता (उपन्यास )२००८ अंतर्मन (काव्य संकलन )२००९ न्याय याचना (खंड काव्य ) 2011 साहित्य पर शोध : 'बीत गए वो पल' संस्मरण में सामाजिक चेतना कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय कुरुक्षेत्र 'आखिर वह क्या करे ' उपन्यास में अन्तर्द्वन्द की अवधारणा विनायक मिशन्स विश्व विद्यालय तमिल नाडू 'भारत में जातीय साम्प्रदायिकता ' उपन्यास में सामाजिक बोध krukshetr विश्व विद्यालय 'मधुरिमा' काव्य नाटक पर शोध कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय नवीन सर्जन : * "व्यक्ति चित्र " नामक नवीं विधा का सर्जन किया है * "त्रि पदी" काव्य की नई विधा का सर्जन किया है अन्य *कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय में आयोजित एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में अंतिम सत्र की अध्यक्षता * शताधिक साहित्यिक समारोह व गोष्ठियों की अध्यक्षता की है अंर्तजाल (Internet) पर प्रकाशित विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशन : www.pravasiduniya.com www.sahityashilpi.com www.p4poetry.com http://sakhikabira.blogspot.com http://aakhrkalsh.blogspot.com http://blog4varta.blogspot.com http://utsahi.blogspot.com www.chrchamnch.com www.janokti.com www.srijangatha.com www.khabarindya.com etc. सम्मान : साहित्य सर्जन के लिए "समाज गौरव "सम्मान भारतीय साहित्यकार संसद द्वारा "मोहन राकेश शिखिर सम्मान पत्रकार विश्व बन्धु सम्मान युवा कार्यक्रम एनम खेल मंत्रालय भारत सरकार द्वारा सम्मान हिमालय और हिंदुस्तान एवार्ड हरियाणा सरकार द्वारा आपात काल के विरुद्ध किये संघर्ष के लिए ताम्र पत्र से सम्मानित विभिन्न विधाओं में निरंतर लेखन....