नदी की व्यथा
मैं पर्वत की गोदी से निकली,
निर्मल जल की धारा बन निकली।
कल-कल करती गीत सुनाती,
धरती की प्यास सदा बुझाती।
खेतों में हरियाली लाई,
सूखी मिट्टी में जान जगाई।
पशु-पक्षी सब मेरे अपने,
सबके जीवन से जुड़े थे सपने।
कभी मुझे गंगा कहकर पूजा,
कभी माँ कहकर शीश नवाया।
पर धीरे-धीरे बदल गया मन,
स्वार्थ ने छीन लिया अपनापन।
कूड़े-कचरे से भर दी काया,
ज़हर का मुझको घूँट पिलाया।
कारखानों का काला पानी,
बन बैठा मेरी दुखभरी कहानी।
मछलियाँ तड़प-तड़प मरती हैं,
लहरें भी अब आँसू भरती हैं।
किनारे सूने, मौन हवाएँ,
किससे अपनी पीर सुनाएँ?
फिर भी बहना मेरा धर्म है,
जीवन देना ही मेरा कर्म है।
मैं आज भी यही पुकार रही,
मानवता को आवाज़ दे रही।
मुझको फिर से निर्मल कर दो,
मेरे जल को फिर अमृत कर दो।
नदियाँ बचेंगी तो कल बचेगा,
तभी तुम्हारा भविष्य सजेगा।
धरती फिर मुस्कान बिखेरेगी,
हर फसल खुशी से लहरेगी।
जब नदी बहेगी स्वच्छ, निश्छल,
तभी रहेगा जीवन उज्ज्वल।
— डॉ. मुल्ला आदम अली
