कविता

एक अमिट शृंगार

नभ-मण्डल से उतरी ज्योत्स्ना,
रची विधाता ने यह तृष्णा।
तुम अनंत शृंगार-प्रतीक,
गरिमामय सौन्दर्य अतीक॥

अचल आस्था के आधार,
मम स्वप्नों के भव्य आकार।
नक्षत्रों की मौन पुकार,
तुम पावन अनुराग-विहार॥

राधा सा निश्छल अनुराग,
रुक्मिणी सा पाणिग्रहण-भाग।
त्याग-तपस्या का हर रूप,
धर्म-रक्षक यह भाव अनूप॥

आत्म-वंदना देह-समर्पण,
तुमको सर्वस्व यह अर्पण।
हृदय-तंत्र की मधुर तरंग,
सहगामिनी मैं सदा प्रसंग॥

सुख-दुःख की संजीवनी-रूप,
अर्पित सप्त-जन्म भव-कूप।
स्नेह-धरा पर घन की धार,
तुम विधाता का काव्य-उदार॥

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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