सुकून की तलाश में
शांत झील किन,
मन ढूँढ़े उजियारा,
मौन मुस्काए।
पत्तों की सरगम,
हवा कहे धीमे से,
थमे व्याकुलता।
ओस की बूँदें,
सूरज का आलिंगन,
जीवन झलके।
पगडंडी मौन,
चलते रहें सपने,
क्षितिज पुकारे।
बादल बहते,
दुःख भी संग उड़ते,
मन हो हल्का।
चिड़िया का गीत,
भोर की कोमल धुन,
आशा जागे।
नदी का प्रवाह,
समय सिखाए धैर्य,
मन निर्मल हो।
सुकून वहीं है,
अपने ही अंतर्मन,
मुस्कान खिले।
— डॉ. अशोक
