पर्यावरण की यही पुकार
विकास की दौड़ में जब जंगल कट जाते हैं,
नदियों के निर्मल दर्पण धुंधले पड़ जाते हैं।
कुछ पल का लाभ भले ही सबको भाता हैं,
प्रकृति का हर आँसू भविष्य रुला जाता हैं।
धरा सिर्फ मिट्टी नहीं, जीवन की पहचान है,
हर पेड़ व नदी, हर पर्वत भारत की शान है।
प्रगति की कीमत हरियाली से चुकानी होगी,
तो आने वाली पीढ़ी की कैसी कहानी होगी?
निर्णय ऐसे हों जिनमें प्रकृति का सम्मान रहे,
विकास के हर पथ पे हरियाली का ध्यान रहे।
पहले सोचें, फिर निर्माण की राह बनाई जाए,
धरती माँ की गोद सदा हँसती-मुस्काती जाए।
सच्चा विकास वो है जो संतुलन का मान करे,
मानव के साथ-साथ ‘प्रकृति’ का सम्मान करे।
आओ ऐसा कल रचें, जहाँ संदेश यही हो सार,
विकास व पर्यावरण बने, एक-दूजे के आधार।
— संजय एम तराणेकर
