मुक्तक/दोहा

बीज का स्वप्न

बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।
स्वर्णिम मन में ख्वाब लिए तब, लेता आंखें मीच।
नया परिवेश कैसा होगा, सुख या दुख की खान।
नये सपनों का आंगन मेरा, होगी न‌ई उड़ान।
संस्कार होंगे उत्तम या तो, भाव मिलें मन नीच।
बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।
अमृत मिलेगा है पीने को, या तो विष का पान।
शोहरत मिले जीवन को या,नफरत अरु अपमान।
मिले स्वर्ग सा सुखी रहूॅं या, वैर द्वेष का कीच।
बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।
अरे आदमी जन्म बीज सा, बन मानव संतान।
जैसी संगत बैठेगा तो, फल वैसा ही जान।
देख कुसंगत पल्ला छोड़ो, मत रहो नैन मींच।
बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।

— शिव सन्याल

*शिव सन्याल

नाम :- शिव सन्याल (शिव राज सन्याल) जन्म तिथि:- 2/4/1956 माता का नाम :-श्रीमती वीरो देवी पिता का नाम:- श्री राम पाल सन्याल स्थान:- राम निवास मकड़ाहन डा.मकड़ाहन तह.ज्वाली जिला कांगड़ा (हि.प्र) 176023 शिक्षा:- इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लोक निर्माण विभाग में सेवाएं दे कर सहायक अभियन्ता के पद से रिटायर्ड। प्रस्तुति:- दो काव्य संग्रह प्रकाशित 1) मन तरंग 2)बोल राम राम रे . 3)बज़्म-ए-हिन्द सांझा काव्य संग्रह संपादक आदरणीय निर्मेश त्यागी जी प्रकाशक वर्तमान अंकुर बी-92 सेक्टर-6-नोएडा।हिन्दी और पहाड़ी में अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। Email:. Sanyalshivraj@gmail.com M.no. 9418063995

Leave a Reply