प्रेम-डोर
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान।
अहं तनिक जो बीच में, उजड़े सब उद्यान॥
धागे के दो छोर हैं, दो जीवन के द्वार।
एक सँभाले याद को, दूजा दे विस्तार॥
कंपन-कंपन कह रहा, जीवन रचा विधान—
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
खींचा यदि अहंकार ने, टूटी हर पहचान।
जीत गए शब्दों मगर, हार गया इंसान॥
झुककर जिसने बाँध ली, वही रहता महान—
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
प्रेम न केवल भाव है, जीवन का आधार।
सूखे मन में भी जगा, हरियाला संसार॥
बाँट सका जो नेह को, पाया अमृत-दान—
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
विश्वासों की उँगलियाँ, थामे जब विश्वास।
अदृश्यों में दिखने लगे, सृष्टि-हृदय के पास॥
ब्रह्मांडों की डोर भी, प्रेममयी पहचान—
प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
