ग़ज़ल
चोटी पगड़ी क्रॉस तिलक या टोपी वाले सब
उस रब की ही संताने हैं गोरे काले सब
सबका रोल अलग है सबके सब आवश्यक हैं
चंद्रप्रभा घनघोर अँधेरे और उजाले सब
शीश झुकाकर रब के ही जैसा पूजो उसको
जिसकी मेहनत से पाते हैं लोग निवाले सब
उसकी कातिल आँखों के आगे सब फीके हैं
तीर खड़ग तलवार कटारी बरछी भाले सब
कष्ट उठाएंगे काहे कुछ काम करेंगे क्यूँ
फ़्री का राशन पाएंगे जब बैठे ठाले सब
सागर की भेजी बूँदे पाते ही उफ़नेंगे
जोहड़ पोखर ताल तलैया नदियाँ नाले सब
जिनको सत्य नही दिखता है उनकी आँखों से
वक्त उतारेगा बंसल जी पर्दे जाले सब
— सतीश बंसल
