मुक्तक/दोहा

प्रेम पुष्प

प्रेम न बोले शोर से, बोले मन की बात।
मौन अधर मुस्काइए, जग जाएँ जज़्बात॥

प्रेम नदी की धार है, निर्मल शीतल नीर।
लगीं इसमें जो डुबकियाँ मिटे हृदय की पीर॥

प्रेम अगर सच्चा मिले, जीवन बने बहार।
सूखी डाली भी लगे, जैसे हो गुलज़ार॥

प्रेम दीप विश्वास का, जलता रहे सदैव।
आँधी चाहे लाख हो, झुक जाएँ सब दैव॥

रूठे पल भी प्रेम से, बन जाते त्योहार।
दो मीठे से बोल ही, कर देते हैं उद्धार॥

तन से बढ़कर मन मिले, मन से बढ़कर प्राण।
ऐसा प्रेम तो विरले मिले, जैसे गीता-ज्ञान॥

— रेनू ‘अंशुल’

रेनू ‘अंशुल'

मैं रेनू अग्रवाल हूँ और रेनू ‘अंशुल’ के नाम से एक साहित्यकार के रूप में जानी पहचानी जाती हूँ । लेखन के साथ साथ मंच संचालन करती हूँ । सामाजिक कार्यों में संलग्न हूँ । पत्र पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं और साथ ही All India Radio से भी मेरे कार्यक्रम ( कविता, कहानी, नाटक, वार्ताएँ आदि) निरंतर प्रसारित होते रहते हैं । कुछ कार्यक्रम दूरदर्शन से भी प्रसारित हुए हैं । मेरी अब तक सात किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । जिनमें दो उपन्यास, दो कविता संग्रह और तीन कहानी संग्रह हैं । उपन्यास के रूप में अगली पुस्तक प्रकाशाधीन है । इस यात्रा में कुछ सम्मान आदि भी मेरी ख़ुशक़िस्मती बने हैं ।

Leave a Reply