भाषा-साहित्य

मैं हूँ लेखक

कभी वह कहता था“मैं भी लिखता हूँ…” इस वाक्य में विनम्रता थी, सीखने की भूख थी, शब्दों के प्रति प्रेम था। वह जानता था कि लेखन कोई उपाधि नहीं, एक साधना है,जहाँ हर शब्द तपकर निकलता है और हर पंक्ति आत्मा से जन्म लेती है।

लेकिन समय बदला कुछ प्रशंसाएँ मिलीं, कुछ मंच मिले, कुछ लोगों का साथ मिला जिन्होंने उसके शब्दों से पहले उसके नाम का गुणगान करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसके स्वर में परिवर्तन आनें लगा और अब वह कहने लगा….“मैं हूँ लेखक…”

और यह “मैं” अब केवल सर्वनाम नहीं रहा अब यह अहंकार का एक़ ऐसा अलंकार बन चुका था। अतः इस अलंकार को अपने ऊपर ऐसे चिपका लिया जैसे कोई चमकदार आवरण हों,जो बाहर से आकर्षक दिखे पर भीतर की सच्चाई को ढँक दे।

वह स्वयं को रूपक मानकर सीढ़ियाँ चढ़ता गया प्रसिद्धि की सीढ़ियाँ, पहचान की सीढ़ियाँ, प्रशंसा की सीढ़ियाँ। पर उन सीढ़ियों के साथ-साथ वह एक जाल भी बुन रहा था। यह जाल दूसरों के लिए नहीं, अनजाने में स्वयं के लिए था अपेक्षाओं का, तुलना का, मान-सम्मान का, और दिखावे का।

वह जितना ऊपर पहुँचा, उतना ही अपने मूल से दूर होता गया। अब शब्द उसके भीतर से नहीं निकलते थे, वे तालियों के लिए लिखे जाने लगे। भावनाएँ सच्चाई से नहीं, प्रभाव से मापी जाने लगीं।और फिर एक दिन वही हुआ जो अक्सर होता है,वह अपने ही बुने जाल में फँस गया। अब न लेख शेष रहा, न लेखक। शेष बची एक टूटी हुई कलम… और एक काला कागज़।

उस काले कागज़ पर कई लेख लिखे गए थे, पर विडंबना यह थी कि उन्हें स्वयं लेखक भी पढ़ न सका। क्योंकि शब्द तो लिखे जा सकते हैं, पर अर्थ तभी जन्म लेते हैं जब भीतर विनम्रता जीवित हो।

आज अनेक नवीन लेखक इसी मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं। थोड़ी-सी लाइमलाइट, कुछ प्रशंसा, कुछ वायरल पंक्तियाँ और धीरे-धीरे वे अपनी असली चमक खोने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि सूर्य कभी यह घोषणा नहीं करता कि वह प्रकाश देता है,उसका प्रकाश स्वयं उसकी पहचान बनता है।

सच्चा लेखक वह नहीं जो स्वयं को लेखक कहे, बल्कि वह है जिसकी लेखनी उसके होने की गवाही दे। लेखन का सौंदर्य प्रसिद्धि में नहीं, प्रामाणिकता में है। जिस दिन लेखक अपने नाम से अधिक अपने शब्दों को महत्व देगा, उसी दिन उसकी कलम फिर से जीवित हो उठेगी।

क्योंकि अंततः लेखक होने का अर्थ “मैं हूँ लेखक” कहना नहीं, बल्कि ऐसा लिख जाना है कि शब्द स्वयं कह उठें “हाँ, यह किसी सच्चे लेखक की लेखनी है।”

— सोमेश देवांगन

सोमेश देवांगन

गोपीबन्द पारा पंडरिया जिला-कबीरधाम (छ.ग.) मो.न.-8962593570

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