बाल कविता – पापा संग सैर
पापा संग जब घूमता, हँसता-हँसता लाल।
उसकी प्यारी मुस्कान से, खिल उठता हर हाल॥
नन्हे-नन्हे पाँव में, सपनों की उड़ान।
हँसते-गाते सीखता, जीवन का सम्मान॥
कार बने जब खेलघर, हँसी बने संगीत।
छोटी-छोटी यात्रियाँ, देती जीवन प्रीत॥
भोली-सी मुस्कान में, खुशियों का संसार।
बचपन सबसे कीमती, ईश्वर का उपहार॥
पापा का यह स्नेह ही, जीवन की पहचान।
उनके संग हर मोड़ पर, मिलता है सम्मान॥
यादों की ये चित्रिका, अमिट रहे हर बार।
बचपन के ये अनमोल पल, सबसे सुंदर हार॥
कार बने जब खेलघर, खुशियों का संसार।
पापा संग हर एक सफ़र, लगता है त्योहार॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
