कहानी

अमीर दोस्त

रमेश के ऑफिस से आने के तुरंत बाद ही सुधा उसपर चिल्ला उठी ,अरे तुमने भी कैसे-कैसे कंगाल लोगों को अपना दोस्त बना रखा है।
मुझे बताओ उस पार्टी में उस विजय को बुलाने की क्या जरूरत थी, वह अपनी पत्नी और तीन बच्चों को लेकर पहुंच गए थे, और खूब मजे से खाया पिया था।
आपको मालूम है न परसों जो हमने फाइव स्टार होटल में अपने बेटे का शानदार जन्मदिन मनाया था उस में कितना खर्चा हुआ, मुझे मालूम है ₹2000 एक प्लेट का तो होटल ने ही लिया था उसके अलावा सजावट संगीत और बाकी खर्चे अलग,और जो तुम्हारे पीने वाले दोस्त हैं उन्होंने भी जम के पी थी और खूब हुड़दंग बचाया था ।
मेरी बात सुनो तुम इतने ऊंचे सरकारी पद पर बैठे हुए हो तुमको अपनी हैसियत के हिसाब से ही लोगों को बुलाना चाहिए था, ना जाने कैसे-कैसे लोगों को आपने उस विजय को भी पार्टी में बुला लिया और वह मुझे पसंद नहीं, उस कंगाल को बुलाने की तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं थी।
रमेश ने बड़े शांत भाव से पत्नी को जवाब दिया , विजय मेरा बचपन का दोस्त है, हम लोग एक साथ पढ़े हैं, खेले हैं उसको मैं कैसे छोड़ सकता था, ठीक है वह बेचारा हमारी हैसियत के तरह इतना अमीर नहीं है लेकिन हमेशा वक्त पर मेरे काम आया है और मुझे दिल से उस से बहुत प्यार है। लेकिन ऐसा क्या कर दिया विजय ने की तुम मुझ पर इतना चिल्ला रही हो।
सुधा का चिल्लाना अभी भी कम नहीं हुआ था ,तुम मानते हो जो हमारे मेहमान आए थे, उन्होंने जो कम से कम शगुन पकड़ाया, वह 11000 से कम नहीं था।
और यह तुम्हारे विजय महाशय , पांच जने आए थे पार्टी में और ₹1100 देकर चले गए।
मुझे कितना बुरा लग रहा है।
रमेश ने फिर धीरे से कहा यह पार्टी मैंने अपने बेटे के जन्मदिन पर खुशी से मनाई थी, कोई पैसे का लेनदेन का हिसाब रखने के लिए नहीं अब तुम शांत हो जाओ, पार्टी बहुत अच्छी रही सब खुश थे मुझे भी अच्छा लगा।

उस दिन तो सुधा यह बात सुनकर चुप रह गई लेकिन उसके मन में यह विचार हमेशा आता रहा कि कैसे-कैसे गरीब लोगों को भी इन्होंने अपना दोस्त बना रखा है और अपनी हैसियत को नहीं समझते।

इस बात को बीते अभी 2 महीने भी नहीं हुए थे कि बेटे के स्कूल से फोन आया आप जल्दी पहुंचे,हमारे स्कूल की बस का एक्सीडेंट हो गया है और आपका बेटा भी था उसमें जो बहुत बुरी तरह से घायल हो गया है, हम बच्चे को लेकर सिटी हॉस्पिटल जा रहे हैं।
सुधा और रमेश तुरंत अस्पताल पहुंचे डॉक्टर ने उन्हें बताया कि बेटे की हालत बहुत नाजुक है, उसका बहुत खून बह चुका है उसे खून की बहुत जरूरत है हमने टेस्ट कर लिया है उसे ए पॉजिटिव या ओ ग्रुप वाला ही खून दे सकता है जल्दी से आप खून का इंतजाम कीजिए की बच्चे की जान बचाई जा सके।
रमेश भागा भागा ब्लड बैंक गया ,बहुत कोशिश की वहां बहुत भीड़ थी उसने खूब चिल्ला चिल्ला कर ए पॉजिटिव ब्लड मांगा लेकिन उसकी कोई नहीं सुन रहा था,
उसको एक ही जवाब मिल रहा था कि हमारे पास खून की बहुत कमी है,हमें खून देने वाले किसी को बुला दो दो और खून के बदले में दूसरा खून ले लो।
सुधा और रमेश दोनों बहुत परेशान हो गए, रमेश ने अपने सभी दोस्तों को बारी-बारी फोन किया और बताया कि हर बार कहा,मुझे खून की है जरूरत है मेरा बेटा नहीं तो नहीं बचेगा लेकिन उसके सभी दोस्तों ने कोई ना कोई बहाना बना दिया कि मैं शहर से बाहर हूं या मैं मीटिंग में हूं , रमेश निकला और शहर के जितने बड़े-बड़े हड़ताल थे सब जगह जाकर उसने खून लेने की कोशिश की लेकिन कहीं भी उसे सफलता नहीं मिली, सब जगह एक ही जवाब था कि खून की कमी है।
शाम हो गई, बेहाल रमेश अस्पताल पहुंचा कि मैं सुधा को संभाल लूंगा परेशान होगी, लेकिन जैसे ही रमेश वहां पहुंचा,सुधा पत्नी ने उसको खुशखबरी सुनाई की बेटे को खून मिल गया है और वह अब खतरे से बाहर है, डॉक्टर ने कहा है कि तीन-चार दिन में आप उसे घर ले जा सकोगे।
पर यह सब कैसे हुआ जब रमेश ने विजय को फोन किया था तो उसने पूरी बात सुनकर,बिना कुछ बोले ,सीधे अस्पताल पहुंचा और अपने तीन-चार रिश्तेदारों और दोस्तों को भी बुला लिया ,छह लोगों ने आकर खून दान दिया और उसके बदले में उन्हें खून मिल गया और बच्चे की जान बच गई।
अब सुधा को भी समझ में आ गया था कि रमेश का सबसे अमीर दोस्त कौन है।
आदमी दिल से अमीर होना चाहिए पैसे से नहीं। सुधा ने आंखों में आंसू भरकर रमेश का हाथ पकड़ा और कहा , सच आपका सबसे अमीर दोस्त विजय ही है।

— जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845

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